इक अजब सानिहा गुज़र गया आज पूरे दिन तेरी याद आई नहीं
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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
Ahmad Faraz
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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किताब फ़िल्म सफ़र इश्क़ शा'इरी औरत कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढ़ता हुआ मैं
Jawwad Sheikh
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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काश वो रास्ते में मिल जाए मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है
Fahmi Badayuni
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तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम
Faiz Ahmad
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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
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लिपट के सोता है तुझ से तमाम शब हर रोज़ तिरे तो तकिए की क़िस्मत भी मुझ से अच्छी रही
Faiz Ahmad
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ख़ुद को थोड़ा सा बचा लेता हूँ मैं कल के लिए सब्र के फल के लिए ज़िन्दगी के हल के लिए मिन्नतें की थी जो रो रो के जिस इक पल के लिए एक पल भी वो नहीं रुक सका इक पल के लिए
Faiz Ahmad
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ख़ुशी के साथ कब तक ज़िन्दगी गुज़ारते हम तिरा मलाल न होता तो मर गए होते मुहाल हो गया है एक पल भी तेरे बिना तू होती तो ज़माने भी गुज़र गए होते
Faiz Ahmad
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