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इक अजब सानिहा गुज़र गया आज पूरे दिन तेरी याद आई नहीं

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तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम

Faiz Ahmad

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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे

Faiz Ahmad

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लिपट के सोता है तुझ से तमाम शब हर रोज़ तिरे तो तकिए की क़िस्मत भी मुझ से अच्छी रही

Faiz Ahmad

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ख़ुद को थोड़ा सा बचा लेता हूँ मैं कल के लिए सब्र के फल के लिए ज़िन्दगी के हल के लिए मिन्नतें की थी जो रो रो के जिस इक पल के लिए एक पल भी वो नहीं रुक सका इक पल के लिए

Faiz Ahmad

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ख़ुशी के साथ कब तक ज़िन्दगी गुज़ारते हम तिरा मलाल न होता तो मर गए होते मुहाल हो गया है एक पल भी तेरे बिना तू होती तो ज़माने भी गुज़र गए होते

Faiz Ahmad

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