गर घड़ी हो ख़राब अपनी ही तो फिर वक़्त के चाल का पता नहीं चलता
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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बात ही कब किसी की मानी है अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी ये कलाई ये जिस्म और ये कमर तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी
Jaun Elia
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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याद कर लेता हूँ रोज़ हर किसी को ज़िन्दगी जाने कब इम्तिहान लेले
Vivek Chaturvedi
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हो गर बराबरी में आना तो बढ़ा कद तू ये लोग, छोटा हो कद तो गले नहीं लगते
Vivek Chaturvedi
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न देखो डालकर आँखों में आँखें तुम नहीं , आँखें तेरी गीली हो जाएँगी
Vivek Chaturvedi
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हवा बुझा देती है जिन के घर के चिरागों को वो जला नहीं सकते अपने हाथों से चिरागों को वो
Vivek Chaturvedi
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अब ज़ख़्म ज़ख़्म से मेरा पाँव भर चुका था या'नी बहुत से रस्तों से मैं गुज़र चुका था
Vivek Chaturvedi
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