घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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तुम जैसे ना-मुराद की सुनता रहा है वो जिस ने नहीं सुनी कभी अपनी भी आज तक
nakul kumar
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काम से निकले तो फिर ये लोग सब घर जाएँगे घर न जा पाए तो फिर ये राह में मर जाएँगे कुछ भी कर जाने को आतुर इश्क़ में जो हैं अगर कुछ न कर पाए तो फिर ये कुछ न कुछ कर जाएँगे
nakul kumar
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इसी ख़ातिर तुझे मिलता नहीं मैं आजकल अक्सर मुझे मालूम है ये मन तिरा भर जाएगा मुझ सेे
nakul kumar
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रख लिया हथियार इक तैयार कर के मार देंगे पर मुझे बीमार कर के कश्तियों की बस्तियों में क्या रुके हम डूबने वाले हैं दरिया पार कर के
nakul kumar
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पीपल बरगद नीम यहाँ पर छाँव ढूॅंढ़ने आते हैं बूढ़े होते नगर यहाँ पर गाँव ढूॅंढ़ने आते हैं चलते-चलते थकने वाले लोग यहाँ पर आख़िर में मेरे इन क़दमों में अपने पाँव ढूॅंढ़ने आते हैं
nakul kumar
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