हस्ब-ए-दस्तूर दिल को सता तो सही तू अदावत ही रख पर निभा तो सही मुझ को देखे पे ज़ुल्फ़ें सँवारे है क्यूँँ इश्क़ के क़ायदों को हटा तो सही
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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हुस्न बला का क़ातिल हो पर आख़िर को बेचारा है इश्क़ तो वो क़ातिल जिस ने अपनों को भी मारा है ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी इस के छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी
Jaun Elia
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उन की सोहबत में गए सँभले दोबारा टूटे हम किसी शख़्स को दे दे के सहारा टूटे ये अजब रस्म है बिल्कुल न समझ आई हमें प्यार भी हम ही करें दिल भी हमारा टूटे
Vikram Gaur Vairagi
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अपने दिल में बसाओगे हम को और गले से लगाओगे हम को हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल तुम तो पागल बनाओगे हम को
Abrar Kashif
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साथ दिया है किस ने किस का किस की सोहबत कौन चलेगा मेरी ज़िल्लत मेरी ख़िफ़्फ़त ले कर तोहमत कौन चलेगा
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझ में अक़्ल कुछ बाक़ी थी आके चर गया मुझ में फ़लसफ़ी अंदाज़ ये है आप की नेमत शा'इरी करता था जो कल मर गया मुझ में
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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जिस तरफ़ भी हाथ डाला ग़म निकल आए हो रफ़ू कैसे बदन की दम निकल आए खा रहा था अक्स तेरा जो रहा मुझ में थे नहीं महफूज़ ख़ुद में हम निकल आए
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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छोड़कर तीर-ए-नज़र जान-ए-जिगर देखो नहीं देखते हो जिस क़दर तुम उस क़दर देखो नहीं
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ज़िक्र होता है तिरा जब भी धड़कता दिल बहुत है भूलना तुझ को सितमगर आज भी मुश्किल बहुत है
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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