हुई है आँख क्यूँ पुर-नम समझ ले ज़फ़र के प्यार को हमदम समझ ले सही जाती नहीं फ़ुर्क़त तिरी अब मिरे ग़म को तू अपना ग़म समझ ले
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मैं भी इक शख़्स पे इक शर्त लगा बैठा था तुम भी इक रोज़ इसी खेल में हारोगे मुझे ईद के दिन की तरह तुम ने मुझे ज़ाया' किया मैं समझता था मुहब्बत से गुज़ारोगे मुझे
Ali Zaryoun
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इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँँ नहीं करते
Farhat Ehsaas
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
Mohsin Naqvi
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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ज़ुल्म की इंतिहा बुरी होगी सोच कर बस ये मर गया कोई
Zafar Siddqui
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ये तुम्हें क्या हुआ है क्या ग़म है तुम बताओ तो आँख क्यूँ नम है एक ही घूँट में शिफ़ा होगी पीके देखो ये आब-ए-ज़मज़म है
Zafar Siddqui
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यार की यार से जुदाई है हिज्र की याद से लड़ाई है ग़म से मेरा उदास है बिस्तर याद तेरी 'ज़फर' जो आई है
Zafar Siddqui
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यूँँ सितम उस ने माँ पे ढाया है माँ के ज़ेवर ही बेच आया है चापलूसी है करता बीवी की और माँ को फ़क़त सताया है
Zafar Siddqui
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प्यास बुझती नहीं होंठ सूखे पड़े हाल क्या हो गया ग़म के बाज़ार में रात कटती है बिस्तर पे करवट में अब चैन लूटा है तू ने सनम प्यार में
Zafar Siddqui
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