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इशारों ही में हाल-ए-दिल मैं सारा खोल जाता हूँ बहुत ख़ामोश रह कर भी बहुत कुछ बोल जाता हूँ

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ज़िक्र होता है तिरा जब भी धड़कता दिल बहुत है भूलना तुझ को सितमगर आज भी मुश्किल बहुत है

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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साथ दिया है किस ने किस का किस की सोहबत कौन चलेगा मेरी ज़िल्लत मेरी ख़िफ़्फ़त ले कर तोहमत कौन चलेगा

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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शाम को दीदार अपना आइने में हो गया फ़ाश सब किरदार अपना आइने में हो गया बरगुज़ीदा एक सूरत क़ैद आँखों में हुई और बस घर-बार अपना आइने में हो गया

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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इश्क़ के बीमार का वाजिब मुक़द्दर मय-कदा राह मुश्किल है न हो हर मील पर गर मय-कदा आदमी होते ‘तहम्मुल’ रोज़ जाते काम पर गर गली ये छोड़ देते है जहाँ पर मय-कदा

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझ में अक़्ल कुछ बाक़ी थी आके चर गया मुझ में फ़लसफ़ी अंदाज़ ये है आप की नेमत शा'इरी करता था जो कल मर गया मुझ में

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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