जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
Munawwar Rana
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तुम भी साबित हुए कमज़ोर मुनव्वर राना ज़िन्दगी माँगी भी तुम ने तो दवा से माँगी
Munawwar Rana
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ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला मगर उम्मीद की ठण्डी हवाएँ रोज़ आती हैं
Munawwar Rana
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उम्र भर साँप से शर्मिंदा रहे ये सुन कर जब से इंसान को काटा है तो फन दुखता है
Munawwar Rana
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इस अहद में हज़ार के नोटों की क़द्र है गाँधी भी ख़ुश नहीं थे चवन्नी पे बैठ कर
Munawwar Rana
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