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रोज़ इक झील राह तकती है खींच लेता है एक अलाव मुझे जन्नती हूँ तो फिर बढ़ो आगे तितलियों आओ गुदगुदाओ मुझे

Azbar Safeer

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पहले कहता है जुनूँ उस का गिरेबान पकड़ फिर मेरा दिल मुझे कहता है इधर कान पकड़ ऐसी वहशत भी न हो घर के दरो बाम कहें कोई आवाज़ ही ले आ कोई मेहमान पकड़

Azbar Safeer

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बिछड़े तो रख रखाव भी करना नहीं पड़ा ताज़ा किसी को घाव भी करना नहीं पड़ा बस देख कर ही उस को परिंदे उतर गए उस को तो आओ आओ भी करना नहीं पड़ा

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चमेली रात कह रही थी मेरी बू लिया करें और इस सेे जी नहीं भरे तो मुझ को छू लिया करें कभी भी अच्छे देवता नहीं बनेंगे ऐसे आप चढ़ावे में रुपए नहीं फ़क़त लहू लिया करें

Azbar Safeer

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दुख की दीमक अगर नहीं लगती ज़िन्दगी किस क़द्र हसीं लगती वस्ल को लॉटरी समझता हूँ लॉटरी रोज़ तो नहीं लगती

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