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कौन समझेगा इस दिवाने को लोग समझे नहीं ज़माने को

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मुख़लिस रहे सख़ी भी रहे मोतबर रहे हर शख़्स की नज़र में मगर मुख़्तसर रहे उस ने बस एक बार में दीवाना कर दिया हम लाख कोशिशों के इवज़ बे-असर रहे

Hameed Sarwar Bahraichi

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कैसा मंज़र था उन की आँखों में इक समुंदर था उन की आँखों में

Hameed Sarwar Bahraichi

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एक किरदार सिमट आया फ़साने भर में ज़ख़्म नासूर हुआ सब को दिखाने भर में थी बड़ी बात बदलता जो हमारा मेआ'र वरना ये साल ही बदलेगा ज़माने भर में

Hameed Sarwar Bahraichi

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हम मुनाफ़िक़ की किसी बात में आएँगे नहीं चाहे तन्हा रहें जज़्बात में आएँगे नहीं ज़र्फ़ वाले हैं मुहब्बत है हमारा पेशा या'नी कुछ भी हो ख़ुराफ़ात में आएँगे नहीं

Hameed Sarwar Bahraichi

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ये सोच कर किसी मजनूँ ने हाथ काटे हैं वो हाथ रख दे किसी ज़ख़्म पर तो शादाबी

Hameed Sarwar Bahraichi

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