कौन समझेगा इस दिवाने को लोग समझे नहीं ज़माने को
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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हम को नीचे उतार लेंगे लोग इश्क़ लटका रहेगा पंखे से
Zia Mazkoor
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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मुख़लिस रहे सख़ी भी रहे मोतबर रहे हर शख़्स की नज़र में मगर मुख़्तसर रहे उस ने बस एक बार में दीवाना कर दिया हम लाख कोशिशों के इवज़ बे-असर रहे
Hameed Sarwar Bahraichi
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कैसा मंज़र था उन की आँखों में इक समुंदर था उन की आँखों में
Hameed Sarwar Bahraichi
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एक किरदार सिमट आया फ़साने भर में ज़ख़्म नासूर हुआ सब को दिखाने भर में थी बड़ी बात बदलता जो हमारा मेआ'र वरना ये साल ही बदलेगा ज़माने भर में
Hameed Sarwar Bahraichi
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हम मुनाफ़िक़ की किसी बात में आएँगे नहीं चाहे तन्हा रहें जज़्बात में आएँगे नहीं ज़र्फ़ वाले हैं मुहब्बत है हमारा पेशा या'नी कुछ भी हो ख़ुराफ़ात में आएँगे नहीं
Hameed Sarwar Bahraichi
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ये सोच कर किसी मजनूँ ने हाथ काटे हैं वो हाथ रख दे किसी ज़ख़्म पर तो शादाबी
Hameed Sarwar Bahraichi
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