मु-ए-जुज़ 'मीर' जो थे फ़न के उस्ताद यही इक रेख़्ता-गो अब रहा है
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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ऐसा नहीं बस आज तुझे प्यार करेंगे ता'उम्र यही काम लगातार करेंगे सरकार करेगी नहीं इस देश का उद्धार उद्धार करेंगे तो कलाकार करेंगे
Tanoj Dadhich
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यही बहुत है मिरे ग़म में तुम शरीक हुए मैं हॅंस पड़ूँगा अगर तुम ने अब दिलासा दिया
Imran Aami
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Mirza Ghalib
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इन दिनों दोस्त मेरे सारे ही रूठे हुए हैं मेरे दुश्मन यही मौक़ा है हरा दे मुझ को
Afzal Ali Afzal
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'मुसहफ़ी' फ़ारसी को ताक़ पे रख अब है अशआर-ए-हिंदवी का रिवाज
Mushafi Ghulam Hamdani
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जी में है इतने बोसे लीजे कि आज महर उस के वहाँ से उठ जावे
Mushafi Ghulam Hamdani
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शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान चाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में
Mushafi Ghulam Hamdani
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डाल कर ग़ुंचों की मुँदरी शाख़-ए-गुल के कान में अब के होली में बनाना गुल को जोगन ऐ सबा
Mushafi Ghulam Hamdani
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सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ जिन लबों से कि मुयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे
Mushafi Ghulam Hamdani
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