शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान चाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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क्या ग़लत-फ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
Tehzeeb Hafi
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए आइना देखा गया, बाल सँवारे गए
Jaun Elia
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इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँँ नहीं करते
Farhat Ehsaas
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डाल कर ग़ुंचों की मुँदरी शाख़-ए-गुल के कान में अब के होली में बनाना गुल को जोगन ऐ सबा
Mushafi Ghulam Hamdani
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'मुसहफ़ी' फ़ारसी को ताक़ पे रख अब है अशआर-ए-हिंदवी का रिवाज
Mushafi Ghulam Hamdani
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मु-ए-जुज़ 'मीर' जो थे फ़न के उस्ताद यही इक रेख़्ता-गो अब रहा है
Mushafi Ghulam Hamdani
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जी में है इतने बोसे लीजे कि आज महर उस के वहाँ से उठ जावे
Mushafi Ghulam Hamdani
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सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ जिन लबों से कि मुयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे
Mushafi Ghulam Hamdani
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