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न भी चमके तो कोई बात नहीं तू तो वैसे ही सितारा है मुझे

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उसे कहो जो बुलाता है गहरे पानी में किनारे से बँधी कश्ती का मसअला समझे

Azhar Faragh

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मुझे लगा था वो टूटे फूलों का ग़म करेगा और उस ने ताज़ा उठा लिए हैं ख़राब रख कर

Azhar Faragh

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जब सर-ए-शाम पजीराई-ए-फ़न होती है शाहज़ादी को कनीज़ों से जलन होती है ले तो आया हूँ तुझे घेर के अपनी जानिब आगे इंसान की अपनी भी लगन होती है

Azhar Faragh

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बता रहा है झटकना तेरी कलाई का ज़रा भी रंज नहीं है तुझे जुदाई का मैं ज़िंदगी को खुले दिल से खर्च करता था हिसाब देना पड़ा मुझ को पाई-पाई का

Azhar Faragh

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वो जो इक शख़्स मुझे ताना-ए-जाँ देता है मरने लगता हूँ तो मरने भी कहाँ देता है तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझ को क़ुबूल ये सहूलत तो मुझे सारा जहाँ देता है

Azhar Faragh

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