पहन ली है तिरी ख़ातिर तबस्सुम ऐ ज़माने उदासी को मिरी तू सह न पाया चार दिन भी
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आप क्यूँँ रोएँगे मेरी ख़ातिर फ़र्ज़ ये सारे इस ग़ुलाम के हैं दिन में सौ बार याद करता हूँ पासवर्ड सारे तेरे नाम के हैं
Aadil Rasheed
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ज़िंदगी भर वो उदासी के लिए काफ़ी है एक तस्वीर जो हँसते हुए खिंचवाई थी
Yasir Khan
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ख़ातिर से या लिहाज़ से, मैं मान तो गया झूठी क़सम से, आप का ईमान तो गया
Dagh Dehlvi
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तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं तबस्सुम इत्र जैसा है हँसी बरसात जैसी है वो जब भी बात करती है तो बातें भीग जाती हैं
Aalok Shrivastav
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लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
Bashir Badr
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ज़रा सा चूक गया मैं तुझे समझने में वगरना ज़ीस्त तिरी धज्जियाँ उड़ाता मैं
Mohit Subran
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यूँँ पाँव पाँव चला उम्र भर मगर देखो चला जहाँ से था मैं लौट के वहीं पहुँचा नहीं ये बात नहीं तय सफ़र किया ही नहीं रहा सफ़र में ही फिर भी कहीं नहीं पहुँचा
Mohit Subran
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ये उदासी भरी इक रात भला कुछ भी नहीं हम ने वो दिन भी हैं काटे कि जो काटे न गए
Mohit Subran
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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प्यार व्यार और नाटक देखो काम कितना है एक जिस्म पाने में ताम-झाम कितना है
Mohit Subran
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