फूटने वाली है मज़दूर के माथे से किरन सुर्ख़ परचम उफ़ुक़-ए-सुब्ह पे लहराते हैं
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जो न खेली होली 'अमृत' के साथ में हाथों में दीवाली तक गुलाल रहेगा
Amritanshu Sharma
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तू उस के दिल में जगह चाहता है यार जो शख़्स किसी को देता नहीं अपने साथ वाली जगह
Umair Najmi
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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
Dushyant Kumar
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शाम को घर लौट के सब की तरह जाता नहीं है यार फ़ौजी है दिवाली पर भी घर आता नहीं है
Subhash Ehsaas
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लोगों ने आराम किया और छुट्टी पूरी की यकुम मई को भी मज़दूरों ने मज़दूरी की
Afzal Khan
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मक़तल-ए-शौक़ के आदाब निराले हैं बहुत दिल भी क़ातिल को दिया करते हैं सर से पहले
Ali Sardar Jafri
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पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है
Ali Sardar Jafri
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ये तेरा गुलिस्ताँ तेरा चमन कब मेरी नवा के क़ाबिल है नग़्मा मिरा अपने दामन में आप अपना गुलिस्ताँ लाता है
Ali Sardar Jafri
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शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत मज़ा तो जब है कि यारों के रू-ब-रू कहिए
Ali Sardar Jafri
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परतव से जिस के आलम-ए-इम्काँ बहार है वो नौ-बहार-ए-नाज़ अभी रहगुज़र में है
Ali Sardar Jafri
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