'saz' jab khula hum par sher koi 'ghaalib' ka hum ne goya baatin ka ek suragh sa paya
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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शे'र अच्छे भी कहो सच भी कहो कम भी कहो दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुस्वा न करो
Abdul Ahad Saaz
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बुरा हो आईने तेरा मैं कौन हूँ न खुल सका मुझी को पेश कर दिया गया मेरी मिसाल में
Abdul Ahad Saaz
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बचपन में हम ही थे या था और कोई वहशत सी होने लगती है यादों से
Abdul Ahad Saaz
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दोस्त अहबाब से लेने न सहारे जाना दिल जो घबराए समुंदर के किनारे जाना
Abdul Ahad Saaz
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पस-मंज़र में 'फ़ीड' हुए जाते हैं इंसानी किरदार फ़ोकस में रफ़्ता रफ़्ता शैतान उभरता आता है
Abdul Ahad Saaz
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