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संसार को बेहद ज़ालिम जान लिया मैं ने फिर उस सेे मिला हाथों को चूम दिया मैं ने जो उस ने किताब-ए-ग़म तोहफ़े में मुझे दी थी इक पन्ना ये याद-ए-रफ़्ता चूम लिया मैं ने

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रिवीज़न सौ दफ़ा कर के था मैं आया क़िताबों के मैं पर्चे भी बना लाया मैं बैठा इश्क़ के इस इम्तिहाँ में जब तो पेपर ही सिलेबस से परे आया

Pritam sihag

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अनजान सफ़र में मैं तन्हा नहीं हूँ यारों घर के सभी ज़िम्मों को जो साथ लिया मैं ने

Pritam sihag

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ये तुम रोज़ किस दरिया में बह रहे हो ये दिल ख़ाली है, तुम कहाँ रह रहे हो ये मैं हूँ कि ग़म में लिखे जा रहा हूँ वो कहते हैं अच्छी ग़ज़ल कह रहे हो

Pritam sihag

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तेरे बग़ैर मेरा अफ़्साना चाहता हूँ या'नी कि ज़िंदगी में वीराना चाहता हूँ यूँँ ही नहीं लगाया सिगरेट को लबों से मैं उस की सारी यादें सुलगाना चाहता हूँ

Pritam sihag

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यूँँ ही नहीं लगाया सिगरेट को लबों से मैं उस की सारी यादें सुलगाना चाहता हूँ

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