अनजान सफ़र में मैं तन्हा नहीं हूँ यारों घर के सभी ज़िम्मों को जो साथ लिया मैं ने
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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संसार को बेहद ज़ालिम जान लिया मैं ने फिर उस सेे मिला हाथों को चूम दिया मैं ने जो उस ने किताब-ए-ग़म तोहफ़े में मुझे दी थी इक पन्ना ये याद-ए-रफ़्ता चूम लिया मैं ने
Pritam sihag
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रिवीज़न सौ दफ़ा कर के था मैं आया क़िताबों के मैं पर्चे भी बना लाया मैं बैठा इश्क़ के इस इम्तिहाँ में जब तो पेपर ही सिलेबस से परे आया
Pritam sihag
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यूँँ तो लिख लूँगा अपने आप ही मेरी कहानी मैं हो इन में नाम गर अपनों के भी शामिल तो क्या होता
Pritam sihag
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यूँँ ही नहीं लगाया सिगरेट को लबों से मैं उस की सारी यादें सुलगाना चाहता हूँ
Pritam sihag
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ये तुम रोज़ किस दरिया में बह रहे हो ये दिल ख़ाली है, तुम कहाँ रह रहे हो ये मैं हूँ कि ग़म में लिखे जा रहा हूँ वो कहते हैं अच्छी ग़ज़ल कह रहे हो
Pritam sihag
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