यूँँ तो लिख लूँगा अपने आप ही मेरी कहानी मैं हो इन में नाम गर अपनों के भी शामिल तो क्या होता
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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कोरे काग़ज़ पर रो रहे हो तुम मैं तो समझा पढ़े लिखे हो तुम क्या कहा मुझ सेे दूर जाना है इस का मतलब है जा चुके हो तुम
Zubair Ali Tabish
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए
Tehzeeb Hafi
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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रिवीज़न सौ दफ़ा कर के था मैं आया क़िताबों के मैं पर्चे भी बना लाया मैं बैठा इश्क़ के इस इम्तिहाँ में जब तो पेपर ही सिलेबस से परे आया
Pritam sihag
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अनजान सफ़र में मैं तन्हा नहीं हूँ यारों घर के सभी ज़िम्मों को जो साथ लिया मैं ने
Pritam sihag
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संसार को बेहद ज़ालिम जान लिया मैं ने फिर उस सेे मिला हाथों को चूम दिया मैं ने जो उस ने किताब-ए-ग़म तोहफ़े में मुझे दी थी इक पन्ना ये याद-ए-रफ़्ता चूम लिया मैं ने
Pritam sihag
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उस ने इक दिन छोड़ने की बात कह दी या'नी मेरे दिल की बातें जानती थी
Pritam sihag
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जानते हो तुम सच्चे इश्क़ की रवानी क्या मरने भर से पूरी हो जाती है कहानी क्या
Pritam sihag
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