तमाम ग़म से अलम से दुखों से गुज़रा है हर एक शख़्स यहाँ हादसों से गुज़रा है
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इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए
Vipul Kumar
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मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया
Tehzeeb Hafi
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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं
Jaun Elia
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दिल का काम तमाम किया है धड़कन ने आराम किया है
Rohit Gustakh
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क़त्ल से पहले वो हर शख़्स के दिल की हसरत पूछ लेता था मगर पूरी नहीं करता था
Vishnu virat
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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ज़रा से शक पे हुआ ख़त्म राब्ता लेकिन ज़रा सा शक न हुआ ख़त्म दरमियाँ से मगर
Mohit Subran
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ज़रा सा चूक गया मैं तुझे समझने में वगरना ज़ीस्त तिरी धज्जियाँ उड़ाता मैं
Mohit Subran
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ये एक सच कि मुसलसल हमारे हिस्से में वही तो ज़िन्दगी आई जो हम ने चाही नहीं
Mohit Subran
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तुम्हें तो ख़ुश-नुमा ख़ुश-रंग है हर एक मौसम ही मगर फ़ुटपाथ के लोगों पे हर मौसम मुसीबत है
Mohit Subran
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