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तेरे दीदार से आँखों को सुकूँ मिलता है ख़ुद से कर-कर के कई बार बहाने आए

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ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है टूटा फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है

SALIM RAZA REWA

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ज़रा सी बात पे रिश्तों को कर दिया घाइल ज़रा सी बात को ले कर उदास बैठे हैं  

 तेरे बग़ैर हर इक शय की आँख पुरनम है 
 हमीं नहीं मह-ओ-अख़्तर उदास बैठे हैं

SALIM RAZA REWA

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यूसुफ़ न बन सका कभी तेरी निगाह में लेकिन तुझे तो मैं ने ज़ुलेख़ा बना दिया

SALIM RAZA REWA

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यूसुफ़ न बन सका कभी तेरी निगाह में लेकिन तुझे तो मैं ने ज़ुलेख़ा बना दिया

SALIM RAZA REWA

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टूटा-फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही 
 अपना घर तो अपना ही घर होता है

 ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें 
 कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है

SALIM RAZA REWA

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