sherKuch Alfaaz

ज़रा सी बात पे रिश्तों को कर दिया घाइल ज़रा सी बात को ले कर उदास बैठे हैं  

 तेरे बग़ैर हर इक शय की आँख पुरनम है 
 हमीं नहीं मह-ओ-अख़्तर उदास बैठे हैं

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ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है टूटा फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है

SALIM RAZA REWA

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उम्र भर मुश्किलें सहता है वो बच्चों के लिए अपनी सब ख़्वाहिशें मिट्टी में दबा देता है हर ख़ुशी छोड़ के परदेस में अपनों के लिए क़तरा क़तरा वो पसीने का बहा देता है

SALIM RAZA REWA

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अच्छा किया जो छोड़ दिया साथ हमारा कब तक सॅंभालते ये दिल-ए-बेक़रार को

SALIM RAZA REWA

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ज़ख़्म सिलने में कई ज़ख़्म दिए टाँकों ने कौन से दर्द का इज़हार करूँँ मैं पहले चोट खाया है मेरे जिस्म का हर-इक हिस्सा कौन से हिस्से को बीमार करूँँ मैं पहले

SALIM RAZA REWA

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टूटा-फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही 
 अपना घर तो अपना ही घर होता है

 ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें 
 कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है

SALIM RAZA REWA

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