तुरूप बनी थी पान एक दिन 'साहिर' दुग्गी भारी थी मेरे इक्के पर
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साल के तीन सौ पैंसठ दिन में एक भी रात नहीं है उस की वो मुझे छोड़ दे और ख़ुश भी रहे इतनी औक़ात नहीं है उस की
Muzdum Khan
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पर्वतों को ज़ख़्म गहरे दे दिए हैं पानियों से पत्थरों पर वार कर के
nakul kumar
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जाने क्या कुछ कर बैठा है बहुत दिनों से घर बैठा है वो मधुमास लिखे भी कैसे शाखों पर पतझर बैठा है
Vigyan Vrat
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कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं यूँँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं
Anjum Rehbar
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गुमान है या किसी विश्वास में है सभी अच्छे दिनों की आस में है ये कैसा जश्न है घर वापसी का अभी तो राम ही वनवास में है
Azhar Iqbal
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उस की दीवार पे तस्वीर बना रक्खी थी मैं ने ख़ुद पाँव की ज़ंजीर बना रक्खी थी लिखते रहने से मेरा ख़ून निकल आया था उस ने काग़ज़ पे भी शमशीर बना रक्खी थी
Saahir
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उस की अच्छी बुरी आदतें सारी मालूम हैं मुझ को साहिर चाँदनी संग मैं दाग़ भी मेरे महताब में देखता हूँ
Saahir
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सभी किताबें बिखेर डाली तुम ने क्यूँ कौन किताबों में अब ख़त को रखता है
Saahir
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पहले ही इश्क़ ने ये बताया मुझे छोड़ कर जाएगी आशिक़ी दर्द में मौत को कहते हैं सब बुरा दर्द क्यूँ कितना आराम है आख़िरी दर्द में
Saahir
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काट लेते हैं उँगली तअज्जुब से दाँतों तले हम जब नई कलियों को फूल बनते हुए देखते हैं
Saahir
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