उस का बोसा पाकर झुमके याँ हर-दम क्यूँ इठलाते हैं बोसा पाकर सोचा हम ने इतना कम क्यूँ इठलाते हैं
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रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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साथ चलते जा रहे हैं पास आ सकते नहीं इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं उस की भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी मजबूरियाँ रोज़ मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
Bashir Badr
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बेवजह मुझ सेे फिर ख़फ़ा क्यूँ है ये कहानी ही हर दफ़ा क्यूँ है कुछ भी मजबूरी तो नहीं दिखती मैं क्या जानूं वो बे-वफ़ा क्यूँ है
Sandeep Thakur
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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे
Vikram Gaur Vairagi
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ये क़ल्ब कहाँ रह पाता है तब काबू में जब बैठा करती है वो मेरे बाज़ू में
Sandeep dabral 'sendy'
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यार मुकम्मल हो न सका अफ़साना जिन का भी उन को बात मुहब्बत की बे-मतलब लगती है
Sandeep dabral 'sendy'
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सपनों पे जिस के पड़ गई भारी कमी इक इंच की बस वो ही लड़का जानता निर्णीत पैमानों का दुख
Sandeep dabral 'sendy'
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सपनों में नइँ, सपनों के पीछे, खो कर सपने पूरे होते हैं
Sandeep dabral 'sendy'
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रुख़सार, जबीं हर बार नज़र खींचे अपनी ओर मैं तिल को नुक्ता बिंदी को महताब लिखूँगा
Sandeep dabral 'sendy'
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