यूँँ बहाएा न कर सर-ए-महफ़िल अश्क आँखों का आब-ए-ज़मज़म है
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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जो दुनिया को सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफ़ान कहते हैं
Rahat Indori
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जौन' उठता है यूँँ कहो या'नी 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' का यार उठता है
Jaun Elia
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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सौ ज़ख़्म दिल पे हैं मेरे सौ ज़ख़्म मेरी जाँ क्या एक-एक दिल मेरा दिखलाए आप को
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ज़ख़्म दर ज़ख़्म ज़िंदगी है और अश्क दर अश्क दास्तान-ए-इश्क़
Ajeetendra Aazi Tamaam
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रोज़ भुनती है आतिश-ए-ग़म पर रूह अपनी कबाब की सी है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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अगर हो कोहर-ए-वासर मुजस्सम कौन दिखता है हों जब गर्दिश में गर तारे तो हमदम कौन दिखता है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तन्हाई में अक्सर हद से गुजरती है जीने नहीं देती यादों की पुरवाई
Ajeetendra Aazi Tamaam
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