तसद्दुक़ इस करम के मैं कभी तन्हा नहीं रहता कि जिस दिन तुम नहीं आते तुम्हारी याद आती है
Top 20 Sher Series
Shayari of Jaleel Manikpuri
Shayari of Jaleel Manikpuri ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.
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Series se pehle kuch standout sher padhein.
शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई
मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है मगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है
आप ने तस्वीर भेजी मैं ने देखी ग़ौर से हर अदा अच्छी ख़मोशी की अदा अच्छी नहीं
जब मैं चलूँ तो साया भी अपना न साथ दे जब तुम चलो ज़मीन चले आसमाँ चले
निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं
कुछ इस अदा से आप ने पूछा मिरा मिज़ाज कहना पड़ा कि शुक्र है परवरदिगार का
क़ासिद पयाम-ए-शौक़ को देना बहुत न तूल कहना फ़क़त ये उन से कि आँखें तरस गईं
रात को सोना न सोना सब बराबर हो गया तुम न आए ख़्वाब में आँखों में ख़्वाब आया तो क्या
होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू जाता कहाँ है शम्अ को परवाना छोड़ कर
ज़िंदगी क्या जो बसर हो चैन से दिल में थोड़ी सी तमन्ना चाहिए
ऐसे छुपने से न छुपना ही था बेहतर तेरा तू है पर्दे में मगर ज़िक्र है घर घर तेरा
सब हुए महव उसे देख जिधर से निकला थे तअ'ज्जुब में कि ये चाँद किधर से निकला
छुपा न राज़ मोहब्बत का बू-ए-गुल की तरह जो बात दिल में थी वो दरमियाँ निकल आई
तसद्दुक़ इस करम के मैं कभी तन्हा नहीं रहता कि जिस दिन तुम नहीं आते तुम्हारी याद आती है
आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की
शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई
आप ने तस्वीर भेजी मैं ने देखी ग़ौर से हर अदा अच्छी ख़मोशी की अदा अच्छी नहीं
जब मैं चलूँ तो साया भी अपना न साथ दे जब तुम चलो ज़मीन चले आसमाँ चले
निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं
कुछ इस अदा से आप ने पूछा मिरा मिज़ाज कहना पड़ा कि शुक्र है परवरदिगार का
क़ासिद पयाम-ए-शौक़ को देना बहुत न तूल कहना फ़क़त ये उन से कि आँखें तरस गईं
रात को सोना न सोना सब बराबर हो गया तुम न आए ख़्वाब में आँखों में ख़्वाब आया तो क्या
होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू जाता कहाँ है शम्अ को परवाना छोड़ कर
ज़िंदगी क्या जो बसर हो चैन से दिल में थोड़ी सी तमन्ना चाहिए
ऐसे छुपने से न छुपना ही था बेहतर तेरा तू है पर्दे में मगर ज़िक्र है घर घर तेरा
सब हुए महव उसे देख जिधर से निकला थे तअ'ज्जुब में कि ये चाँद किधर से निकला
छुपा न राज़ मोहब्बत का बू-ए-गुल की तरह जो बात दिल में थी वो दरमियाँ निकल आई
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Shayari of Jaleel Manikpuri FAQs
Jaleel Manikpuri Top 20 me kya milega?
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