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Shayari of Nushoor Wahidi

Shayari of Nushoor Wahidi ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई

हज़ार शम्अ फ़रोज़ाँ हो रौशनी के लिए नज़र नहीं तो अंधेरा है आदमी के लिए

~ Unknown

मैं अभी से किस तरह उन को बेवफ़ा कहूँ मंज़िलों की बात है रास्ते में क्या कहूँ

~ Unknown

क़दम मय-ख़ाना में रखना भी कार-ए-पुख़्ता-काराँ है जो पैमाना उठाते हैं वो थर्राया नहीं करते

~ Unknown

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार गुल बना सकता है तू शबनम बना सकता हूँ मैं

ज़माना याद करे या सबा करे ख़ामोश हम इक चराग़-ए-मोहब्बत जलाए जाते हैं

~ Unknown

यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन-ए-गुलिस्ताँ में कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते

~ Unknown

ज़िंदगी परछाइयाँ अपनी लिए आइनों के दरमियाँ से आई है

~ Unknown

हक़ीक़त जिस जगह होती है ताबानी बताती है कोई पर्दे में होता है तो चिलमन जगमगाती है

~ Unknown

हस्ती का नज़ारा क्या कहिए मरता है कोई जीता है कोई जैसे कि दिवाली हो कि दिया जलता जाए बुझता जाए

~ Unknown

है शाम अभी क्या है बहकी हुई बातें हैं कुछ रात ढले साक़ी मय-ख़ाना सँभलता है

~ Unknown

ख़ाक और ख़ून से इक शम्अ जलाई है 'नुशूर' मौत से हम ने भी सीखी है हयात-आराई

~ Unknown

अग़्यार को गुल-पैरहनी हम ने अता की अपने लिए फूलों का कफ़न हम ने बनाया

~ Unknown

'नुशूर' आलूदा-ए-इस्याँ सही पर कौन बाक़ी है ये बातें राज़ की हैं क़िब्ला-ए-आलम भी पीते हैं

~ Unknown

अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई

दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है

मैं अभी से किस तरह उन को बेवफ़ा कहूँ मंज़िलों की बात है रास्ते में क्या कहूँ

~ Unknown

क़दम मय-ख़ाना में रखना भी कार-ए-पुख़्ता-काराँ है जो पैमाना उठाते हैं वो थर्राया नहीं करते

~ Unknown

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार गुल बना सकता है तू शबनम बना सकता हूँ मैं

ज़माना याद करे या सबा करे ख़ामोश हम इक चराग़-ए-मोहब्बत जलाए जाते हैं

~ Unknown

यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन-ए-गुलिस्ताँ में कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते

~ Unknown

ज़िंदगी परछाइयाँ अपनी लिए आइनों के दरमियाँ से आई है

~ Unknown

हक़ीक़त जिस जगह होती है ताबानी बताती है कोई पर्दे में होता है तो चिलमन जगमगाती है

~ Unknown

हस्ती का नज़ारा क्या कहिए मरता है कोई जीता है कोई जैसे कि दिवाली हो कि दिया जलता जाए बुझता जाए

~ Unknown

है शाम अभी क्या है बहकी हुई बातें हैं कुछ रात ढले साक़ी मय-ख़ाना सँभलता है

~ Unknown

ख़ाक और ख़ून से इक शम्अ जलाई है 'नुशूर' मौत से हम ने भी सीखी है हयात-आराई

~ Unknown

अग़्यार को गुल-पैरहनी हम ने अता की अपने लिए फूलों का कफ़न हम ने बनाया

~ Unknown

'नुशूर' आलूदा-ए-इस्याँ सही पर कौन बाक़ी है ये बातें राज़ की हैं क़िब्ला-ए-आलम भी पीते हैं

~ Unknown

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Shayari of Nushoor Wahidi FAQs

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