Top 20 Sher Series

Shayari of Shakeb Jalali

Shayari of Shakeb Jalali ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका

~ Shakeb Jalali

सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में

जाती है धूप उजले परों को समेट के ज़ख़्मों को अब गिनूँगा मैं बिस्तर पे लेट के

~ Shakeb Jalali

लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को ज़ख़्म गहरा ही सही ज़ख़्म है भर जाएगा

मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

~ Shakeb Jalali

यूँ तो सारा चमन हमारा है फूल जितने भी हैं पराए हैं

उतर के नाव से भी कब सफ़र तमाम हुआ ज़मीं पे पाँव धरा तो ज़मीन चलने लगी

न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है

आ के पत्थर तो मिरे सेहन में दो-चार गिरे जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे

लोग दुश्मन हुए उसी के 'शकेब' काम जिस मेहरबान से निकला

आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर दीमक ने जो लिखे कभी वो तब्सिरे भी देख

गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था हरा-भरा बदन अपना दरख़्त ऐसा था

तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका

~ Shakeb Jalali

सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में

जाती है धूप उजले परों को समेट के ज़ख़्मों को अब गिनूँगा मैं बिस्तर पे लेट के

~ Shakeb Jalali

लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को ज़ख़्म गहरा ही सही ज़ख़्म है भर जाएगा

मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

~ Shakeb Jalali

यूँ तो सारा चमन हमारा है फूल जितने भी हैं पराए हैं

उतर के नाव से भी कब सफ़र तमाम हुआ ज़मीं पे पाँव धरा तो ज़मीन चलने लगी

न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है

आ के पत्थर तो मिरे सेहन में दो-चार गिरे जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे

लोग दुश्मन हुए उसी के 'शकेब' काम जिस मेहरबान से निकला

आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर दीमक ने जो लिखे कभी वो तब्सिरे भी देख

गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था हरा-भरा बदन अपना दरख़्त ऐसा था

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Shayari of Shakeb Jalali FAQs

Shakeb Jalali Top 20 me kya milega?

Shakeb Jalali ke selected sher readable cards, internal detail links, aur writer discovery ke saath milenge.

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Haan, collection links, writer links aur detail links sab Kuch Alfaaz ke internal routes par map kiye gaye hain.

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