जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है जब याद हम आ जाएँ मिलने की दुआ करना
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Shayari on Dua
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दुआ को हात उठाते हुए लरज़ता हूँ कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले हँसी आ रही है तिरी सादगी पर
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ
कोई चारह नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
यह शेर बताता है कि बार-बार माँगना ही काफी नहीं होता। प्रार्थना की ताकत गिनती में नहीं, सच्चे भाव में है; जो बात दिल की गहराई से उठे वही असर करती है। यहाँ दिल को सच्चाई की कसौटी बनाया गया है। भाव यह है कि बिना दिखावे के, भीतर से निकली पुकार ही असली दुआ है।
माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ
यहाँ कवि व्यंग्य में अपनी बेबसी दिखाता है: जब प्रार्थना का फल अक्सर उल्टा निकलता है, तो वह जानबूझकर विरह ही माँगने की बात करता है। “दुश्मनी” का अर्थ है इच्छा और नतीजे के बीच टकराव—जैसे भाग्य साथ न दे रहा हो। भाव-केन्द्र में टूटन, डर और कटु irony है।
बाक़ी ही क्या रहा है तुझे माँगने के बाद बस इक दुआ में छूट गए हर दुआ से हम
न चारागर की ज़रूरत न कुछ दवा की है दुआ को हाथ उठाओ कि ग़म की रात कटे
अभी दिलों की तनाबों में सख़्तियाँ हैं बहुत अभी हमारी दुआ में असर नहीं आया
धूप साए की तरह फैल गई इन दरख़्तों की दुआ लेने से
मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे
जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है जब याद हम आ जाएँ मिलने की दुआ करना
दुआ को हात उठाते हुए लरज़ता हूँ कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले हँसी आ रही है तिरी सादगी पर
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ
कोई चारह नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
यह शेर बताता है कि बार-बार माँगना ही काफी नहीं होता। प्रार्थना की ताकत गिनती में नहीं, सच्चे भाव में है; जो बात दिल की गहराई से उठे वही असर करती है। यहाँ दिल को सच्चाई की कसौटी बनाया गया है। भाव यह है कि बिना दिखावे के, भीतर से निकली पुकार ही असली दुआ है।
माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ
यहाँ कवि व्यंग्य में अपनी बेबसी दिखाता है: जब प्रार्थना का फल अक्सर उल्टा निकलता है, तो वह जानबूझकर विरह ही माँगने की बात करता है। “दुश्मनी” का अर्थ है इच्छा और नतीजे के बीच टकराव—जैसे भाग्य साथ न दे रहा हो। भाव-केन्द्र में टूटन, डर और कटु irony है।
माँगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की शर्मिंदा आज तक हैं मियाँ ज़िंदगी से हम
मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे
न चारागर की ज़रूरत न कुछ दवा की है दुआ को हाथ उठाओ कि ग़म की रात कटे
दुश्मन-ए-जाँ ही सही दोस्त समझता हूँ उसे बद-दुआ जिस की मुझे बन के दुआ लगती है
धूप साए की तरह फैल गई इन दरख़्तों की दुआ लेने से
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Shayari on Dua FAQs
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