ghazalKuch Alfaaz

aadmi khvar bhi hota hai nahin bhi hota ishq azar bhi hota hai nahin bhi hota ye jo kuchh log khayalon men raha karte hain un ka ghar-bar bhi hota hai nahin bhi hota zindagi sahl-pasandi men basar kar lena kar-e-dushvar bhi hota hai nahin bhi hota kar-e-duniya hi kuchh aisa hai ki dil se tira dard silsila-var bhi hota hai nahin bhi hota shadi-o-marg ne ye nukta bataya hai ki vaqt tez-raftar bhi hota hai nahin bhi hota 'afzal' aur qais ne qanun banaya hai ki ishq dusri baar bhi hota hai nahin bhi hota aadmi khwar bhi hota hai nahin bhi hota ishq aazar bhi hota hai nahin bhi hota ye jo kuchh log khayalon mein raha karte hain un ka ghar-bar bhi hota hai nahin bhi hota zindagi sahl-pasandi mein basar kar lena kar-e-dushwar bhi hota hai nahin bhi hota kar-e-duniya hi kuchh aisa hai ki dil se tera dard silsila-war bhi hota hai nahin bhi hota shadi-o-marg ne ye nukta bataya hai ki waqt tez-raftar bhi hota hai nahin bhi hota 'afzal' aur qais ne qanun banaya hai ki ishq dusri bar bhi hota hai nahin bhi hota

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी मोहब्बत की कहानी में अदाकारी नहीं करनी हवा के ख़ौफ़ से लिपटा हुआ हूँ ख़ुश्क टहनी से कहीं जाना नहीं जाने की तय्यारी नहीं करनी तहम्मुल ऐ मोहब्बत हिज्र पथरीला इलाक़ा है तुझे इस रास्ते पर तेज़-रफ़्तारी नहीं करनी हमारा दिल ज़रा उकता गया था घर में रह रह कर यूँँही बाज़ार आए हैं ख़रीदारी नहीं करनी ग़ज़ल को कम-निगाहों की पहुँच से दूर रखता हूँ मुझे बंजर दिमाग़ों में शजर-कारी नहीं करनी वसिय्यत की थी मुझ को क़ैस ने सहरा के बारे में ये मेरा घर है इस की चार-दीवारी नहीं करनी

Afzal Khan

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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता

Afzal Khan

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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता

Afzal Khan

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आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं मसअला हल हो तो हल का मसअला छेड़ूँगा मैं वस्ल ओ हिज्राँ में तनासुब रास्त होना चाहिए इश्क़ के रद्द-ए-अमल का मसअला छेड़ूँगा मैं देखना सब लोग मुझ को ख़ारिजी ठहराएँगे कल यहाँ जंग-ए-जमल का मसअला छेड़ूँगा मैं कश्तियों वाले मुझे तावान दे कर पार जाएँ वर्ना लहरों में ख़लल का मसअला छेड़ूँगा मैं मिल ही जाएँगे कहीं तो मुझ को 'बेदिल-हैदरी' कूज़ा-गर वाली ग़ज़ल का मसअला छेड़ूँगा मैं इस शजर की एक टहनी परले आँगन में भी है अपने हम-साए से फल का मसअला छेड़ूँगा मैं

Afzal Khan

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आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं मसअला हल हो तो हल का मसअला छेड़ूँगा मैं वस्ल ओ हिज्राँ में तनासुब रास्त होना चाहिए इश्क़ के रद्द-ए-अमल का मसअला छेड़ूँगा मैं देखना सब लोग मुझ को ख़ारिजी ठहराएँगे कल यहाँ जंग-ए-जमल का मसअला छेड़ूँगा मैं कश्तियों वाले मुझे तावान दे कर पार जाएँ वर्ना लहरों में ख़लल का मसअला छेड़ूँगा मैं मिल ही जाएँगे कहीं तो मुझ को 'बेदिल-हैदरी' कूज़ा-गर वाली ग़ज़ल का मसअला छेड़ूँगा मैं इस शजर की एक टहनी परले आँगन में भी है अपने हम-साए से फल का मसअला छेड़ूँगा मैं

Afzal Khan

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