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अब नज़रअंदाज़ करने की भी आसानी नहीं कौन सी सी जा है जहाँ मैं ज़ेर-ए-निगरानी नहीं बात कर ऐ ख़ूब-सूरत शख़्स कोई बात कर और साबित कर तुझे कोई परेशानी नहीं हम गुज़ारिश पर गुज़ारा कर रहे है इन दिनों तुझ सेे तुझ को छीन लेने की अभी ठानी नहीं

Abbas Tabish12 Likes

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है

Abbas Tabish

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न पूछ कितने है बेताब देखने के लिए हम एक साथ कईं ख़्वाब देखने के लिए मैं अपने आप से बाहर निकल के बैठ गया कि आज आएँगे अहबाब देखने के लिए जमाने बा'द बिल-आख़िर वो रात आ गई है कि लोग निकले है महताब देखने के लिए सुनहरी लड़कियों इनको मिलो मिलो न मिलो गरीब होते है बस ख़्वाब देखने के लिए मुझे यक़ीं है कि तुम आईना भी देखोगे मेरी शिकस्त के असबाब देखने के लिए

Abbas Tabish

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तुम हो तो क़रीब और क़रीब-ए-रग-ए-जाँ हो फिर क्यूँ ये मुझे पूछना पड़ता है कहाँ हो मुमकिन है कि इस बाग़ में दम घुटने का बायस ख़ुश्बू जिसे कहते हैं वो फूलों का धुआँ हो तुम सेे तो पढ़ी जाती नहीं अश्कों की सतरें जैसे ये किसी और जहाँ की ज़बाँ हो इस तरह सरे-फ़र्श-ए-'अज़ा बैठी है 'ताबिश' जैसे ये उदासी किसी मक़तूल की माँ हो माँ थी तो मुझे रात नहीं पड़ती थी बाहर अब कोई नहीं पूछता 'अब्बास' कहाँ हो

Abbas Tabish

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टूटते इश्क़ में कुछ हाथ बँटाते जाते सारा मलबा मेरे ऊपर न गिराते जाते इतनी उजलत में भी क्या आँख से ओझल होना जा रहे थे तो मुझे तुम नज़र आते जाते कम से कम रखता पलटने की तवक़्क़ो तुम से हाथ में हाथ लिया था तो दबाते जाते किन अँधेरों में मुझे छोड़ दिया है तुम ने इस से बेहतर था मुझे आग लगाते जाते मैं भी होता तेरे रस्ते के दरख़्तों में दरख़्त इस तरह देख तो लेता तुझे आते जाते

Abbas Tabish

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मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैं हंस तालाब पे आते हैं चले जाते हैं इस लिए अब मैं किसी को नहीं जाने देता जो मुझे छोड़ के जाते हैं चले जाते हैं मेरी आँखों से बहा करती है उन की ख़ुशबू रफ़्तगाँ ख़्वाब में आते हैं चले जाते हैं शादी -इ -मार्ग का माहौल बना रहता है आप आते हैं रुलाते हैं चले जाते हैं कब तुम्हें इश्क़ पे मजबूर किया है हम ने हम तो बस याद दिलाते हैं चले जाते हैं आप को कौन तमाशाई समझता है यहाँ आप तो आग लगते हैं चले जाते हैं हाथ पत्थर को बाधाओं तो सगण -इ -दुनिया हैरती बन के दिखते हैं चले जाते हैं

Abbas Tabish

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