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ab to shahron se khabar aati hai divanon ki koi pahchan hi baaqi nahin viranon ki apni poshak se hushyar ki khuddam-e-qadim dhajjiyan mangte hain apne garebanon ki sanaten phailti jaati hain magar is ke saath sarhaden tutti jaati hain gulistanon ki dil men vo zakhm khile hain ki chaman kya shai hai ghar men barat si utri hui gul-danon ki un ko kya fikr ki main paar laga ya duuba bahs karte rahe sahil pe jo tufanon ki teri rahmat to musallam hai magar ye to bata kaun bijli ko khabar deta hai kashanon ki maqbare bante hain zindon ke makanon se buland kis qadar auj pe takrim hai insanon ki ek ik yaad ke hathon pe charaghhon bhare tasht kaaba-e-dil ki faza hai ki sanam-khanon ki ab to shahron se khabar aati hai diwanon ki koi pahchan hi baqi nahin viranon ki apni poshak se hushyar ki khuddam-e-qadim dhajjiyan mangte hain apne garebanon ki sanaten phailti jati hain magar is ke sath sarhaden tutti jati hain gulistanon ki dil mein wo zakhm khile hain ki chaman kya shai hai ghar mein baraat si utri hui gul-danon ki un ko kya fikr ki main par laga ya duba bahs karte rahe sahil pe jo tufanon ki teri rahmat to musallam hai magar ye to bata kaun bijli ko khabar deta hai kashanon ki maqbare bante hain zindon ke makanon se buland kis qadar auj pe takrim hai insanon ki ek ek yaad ke hathon pe charaghon bhare tasht kaba-e-dil ki faza hai ki sanam-khanon ki

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

Ahmad Nadeem Qasmi

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एहसास में फूल खिल रहे हैं पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं कुछ इतनी शदीद तीरगी है आँखों में सितारे तैरते हैं देखें तो हवा जमी हुई है सोचें तो दरख़्त झूमते हैं सुक़रात ने ज़हर पी लिया था हम ने जीने के दुख सहे हैं हम तुझ से बिगड़ के जब भी उठे फिर तेरे हुज़ूर आ गए हैं हम अक्स हैं एक दूसरे का चेहरे ये नहीं हैं आइने हैं लम्हों का ग़ुबार छा रहा है यादों के चराग़ जल रहे हैं सूरज ने घने सनोबरों में जाले से शुआ'ओं के बुने हैं यकसाँ हैं फ़िराक़-ओ-वस्ल दोनों ये मरहले एक से कड़े हैं पा कर भी तो नींद उड़ गई थी खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं जो दिन तिरी याद में कटे थे माज़ी के खंडर बने खड़े हैं जब तेरा जमाल ढूँडते थे अब तेरा ख़याल ढूँडते हैं हम दिल के गुदाज़ से हैं मजबूर जब ख़ुश भी हुए तो रोए हैं हम ज़िंदा हैं ऐ फ़िराक़ की रात प्यारी तिरे बाल क्यूँँ खुले हैं

Ahmad Nadeem Qasmi

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फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए

Ahmad Nadeem Qasmi

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मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता एक ज़र्रा भी तो बे-कार नहीं हो सकता इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे कि फ़रिश्ता मिरा मेआ'र नहीं हो सकता ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा क्या है तेरा शहकार तो फ़िन्नार नहीं हो सकता ऐ हक़ीक़त को फ़क़त ख़्वाब समझने वाले तू कभी साहिब-ए-असरार नहीं हो सकता तू कि इक मौजा-ए-निकहत से भी चौंक उठता है हश्र आता है तो बेदार नहीं हो सकता सर-ए-दीवार ये क्यूँँ निर्ख़ की तकरार हुई घर का आँगन कभी बाज़ार नहीं हो सकता राख सी मज्लिस-ए-अक़्वाम की चुटकी में है क्या कुछ भी हो ये मिरा पिंदार नहीं हो सकता इस हक़ीक़त को समझने में लुटाया क्या कुछ मेरा दुश्मन मिरा ग़म-ख़्वार नहीं हो सकता मैं ने भेजा तुझे ऐवान-ए-हुकूमत में मगर अब तो बरसों तिरा दीदार नहीं हो सकता तीरगी चाहे सितारों की सिफ़ारिश लाए रात से मुझ को सरोकार नहीं हो सकता वो जो शे'रों में है इक शय पस-ए-अल्फ़ाज़ 'नदीम' उस का अल्फ़ाज़ में इज़हार नहीं हो सकता

Ahmad Nadeem Qasmi

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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ

Ahmad Nadeem Qasmi

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