ghazalKuch Alfaaz

ashk piine ke liye khaak udane ke liye ab mire paas khazana hai lutane ke liye aisi dafa na laga jis men zamanat mil jaae mere kirdar ko chun apne nishane ke liye kin zaminon pe utaroge ab imdad ka qahr kaun sa shahr ujadoge basane ke liye main ne hathon se bujhai hai dahakti hui aag apne bachche ke khilaune ko bachane ke liye ho gai hai miri ujdi hui duniya abad main use dhundh raha huun ye batane ke liye nafraten bechne valon ki bhi majburi hai maal to chahiye dukan chalane ke liye ji to kahta hai ki bistar se na utrun kai roz ghar men saman to ho baith ke khane ke liye ashk pine ke liye khak udane ke liye ab mere pas khazana hai lutane ke liye aisi dafa na laga jis mein zamanat mil jae mere kirdar ko chun apne nishane ke liye kin zaminon pe utaroge ab imdad ka qahr kaun sa shahr ujadoge basane ke liye main ne hathon se bujhai hai dahakti hui aag apne bachche ke khilaune ko bachane ke liye ho gai hai meri ujdi hui duniya aabaad main use dhundh raha hun ye batane ke liye nafraten bechne walon ki bhi majburi hai mal to chahiye dukan chalane ke liye ji to kahta hai ki bistar se na utrun kai roz ghar mein saman to ho baith ke khane ke liye

Related Ghazal

तुम्हारा रंग दुनिया ने छुआ था तब कहाँ थे तुम? हमारा कैनवस ख़ाली पड़ा था तब कहाँ थे तुम? मेरे लशकर में शिरकत की इजाज़त माँगने वालो! मैं परचम थाम कर तन्हा खड़ा था तब कहाँ थे तुम? तुम्हारी दस्तकों पर रहम आता है मुझे लेकिन ये दरवाज़ा कई दिन से खुला था तब कहाँ थे तुम? फलों पर हक़ जताने आए हो तो ये भी बतला दो मैं जब पौधों को पानी दे रहा था तब कहाँ थे तुम? ये बस इक रस्मिया तफ़तीश है, आराम से बैठो वफ़ा का ख़ून जिस शब को हुआ था तब कहाँ थे तुम? मुआ'फ़ी चाहता हूँ अब तो बस ख़बरों से मतलब है मैं जब रूमानी फ़िल्में देखता था तब कहाँ थे तुम?

Zubair Ali Tabish

34 likes

कोई मिसाल नहीं है तिरी मिसाल के बा'द मैं बे ख़याल हुआ हूँ तिरे ख़याल के बा'द बस इक मलाल पे तू ज़िन्दगी तमाम न कर बड़े मलाल मिलेगें मिरे मलाल के बा'द हर एक ज़ख़्म को अश्कों से धो के चूम लिया मैं ऐसे ठीक हुआ उस की देख-भाल के बा'द उलझ के रह गया वो जाल में तबीबों के मरीज़ घर नहीं लौटा है अस्पताल के बा'द दुआ सलाम से आगे मैं बढ़ नहीं पाता उसे भी सोचना पड़ता है हाल-चाल के बा'द हमारे बीच में जो है सही नहीं है वो उसे ये याद भी आया तो चार साल के बा'द हज़ारों ख़्वाब जो आँखों के आसरे थे कभी यतीम हो गए आँखों के इंतिक़ाल के बा'द

Varun Anand

22 likes

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले डरे क्यूँँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँँ दम-ब-दम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

Mirza Ghalib

26 likes

लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है सिलवटें चीख़ती रहती हैं मिरे बिस्तर की करवटों में ही मिरी रात कटा करती है वक़्त थम जाता है अब रात गुज़रती ही नहीं जाने दीवार-घड़ी रात में क्या करती है चाँद खिड़की में जो आता था नहीं आता अब तीरगी चारों तरफ़ रक़्स किया करती है मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है

Abbas Qamar

27 likes

फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

53 likes

More from Shakeel Jamali

कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उस की मर्ज़ी मगर सबूतों से छेड़खानी नहीं चलेगी बड़ों के नक्श-ए-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी अगर वो अपनी ज़री की साड़ी पहन के निकली तो यार लोगों पे शेरवानी नहीं चलेगी वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की खिदमतें हैं तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी बहुत ज़ियादा भी मुत्मइन मत दिखाई देना बिछड़ते लम्हों में शादवानी नहीं चलेगी

Shakeel Jamali

10 likes

लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते हैं मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं ज़िंदगी ऐसे भी हालात बना देती है लोग साँसों का कफ़न ओढ़ के मर जाते हैं पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं क्या जुनूँ-ख़ेज़ मसाफ़त थी तिरे कूचे की और अब यूँँ है कि ख़ामोश गुज़र जाते हैं ये मोहब्बत की अलामत तो नहीं है कोई तेरा चेहरा नज़र आता है जिधर जाते हैं

Shakeel Jamali

5 likes

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं इक बीमार वसीयत करने वाला है रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं अभी न जाने कितना हँसना रोना है अभी तो हम सेे पहले वाले बैठे हैं साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं अंदर डोरी टूट रही है साँसों की बाहर बीमा करने वाले बैठे हैं

Shakeel Jamali

9 likes

वफ़ादारों पे आफ़त आ रही है मियाँ ले लो जो क़ीमत आ रही है मैं उस से इतने वा'दे कर चुका हूँ मुझे इस बार ग़ैरत आ रही है न जाने मुझ में क्या देखा है उस ने मुझे उस पर मोहब्बत आ रही है बदलता जा रहा है झूट सच में कहानी में सदाक़त आ रही है मिरा झगड़ा ज़माने से नहीं है मिरे आड़े मोहब्बत आ रही है अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता वो देखो एक औरत आ रही है मुझे उस की उदासी ने बताया बिछड़ जाने की साअ'त आ रही है बड़ों के दरमियाँ बैठा हुआ हूँ नसीहत पर नसीहत आ रही है

Shakeel Jamali

7 likes

सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर खाना चाहता है जिसे भी डूबना हो डूब जाए समुंदर सूख जाना चाहता है हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने सुना है हज को जाना चाहता है

Shakeel Jamali

19 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Shakeel Jamali.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Shakeel Jamali's ghazal.