अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी वरना मैं तो माला ले कर आया था मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ जिस ने सब सेे पहले रंग लगाया था मेरी राय सब सेे पहले ली जाए मैं ने सब सेे पहले धोख़ा खाया था सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में सब सेे पहले किस ने हाथ छुड़ाया था इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है इक लड़की ने अच्छे से समझाया था
Zubair Ali Tabish
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समुंदर उल्टा सीधा बोलता है सलीक़े से तो प्यासा बोलता है यहाँ तो उस का पैसा बोलता है वहाँ देखेंगे वो क्या बोलता है तुम्हारे साथ उड़ाने बोलती है हमारे साथ पिंजरा बोलता है निगाहें करती रह जाती हैं हिज्जे वो जब चेहरे से इमला बोलता है मैं चुप रहता हूँ इतना बोल कर भी तू चुप रह कर भी कितना बोलता है मैं हर शाइ'र में ये भी देखता हूँ बिना माइक के वो क्या बोलता है
Fahmi Badayuni
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
Obaidullah Aleem
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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था
Obaidullah Aleem
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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ
Obaidullah Aleem
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बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स हुआ चराग़ तो घर ही जला गया इक शख़्स तमाम रंग मिरे और सारे ख़्वाब मिरे फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स मैं किस हवा में उड़ूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर मुझे ये कौन से रस्ते लगा गया इक शख़्स मोहब्बतें भी अजब उस की नफ़रतें भी कमाल मिरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे मिले वो ज़ख़्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स खुला ये राज़ कि आईना-ख़ाना है दुनिया और उस में मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स
Obaidullah Aleem
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हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते हम बहर-हाल बसर ख़्वाब तुम्हारा करते एक ऐसी भी घड़ी इश्क़ में आई थी कि हम ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते मेहव-ए-आराइश-ए-रुख़ है वो क़यामत सर-ए-बाम आँख अगर आईना होती तो नज़ारा करते एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे किस से करते जो कोई इश्क़ दोबारा करते जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए फिर कोई आए यहाँ कैसे गवारा करते कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब तेरी जानिब ही तिरे लोग इशारा करते ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ और तिरा हुस्न कहाँ हम तिरे चेहरे से आईना सँवारा करते
Obaidullah Aleem
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