bada viran mausam hai kabhi milne chale aao har ik janib tira ghham hai kabhi milne chale aao hamara dil kisi gahri judai ke bhanvar men hai hamari aankh bhi nam hai kabhi milne chale aao mire hamrah garche duur tak logon ki raunaq hai magar jaise koi kam hai kabhi milne chale aao tumhen to ilm hai mere dil-e-vahshi ke zakhmon ko tumhara vasl marham hai kabhi milne chale aao andheri raat ki gahri khamoshi aur tanha dil diye ki lau bhi maddham hai kabhi milne chale aao tumhare ruuth ke jaane se ham ko aisa lagta hai muqaddar ham se barham hai kabhi milne chale aao havaon aur phulon ki nai khushbu batati hai tire aane ka mausam hai kabhi milne chale aao bada viran mausam hai kabhi milne chale aao har ek jaanib tera gham hai kabhi milne chale aao hamara dil kisi gahri judai ke bhanwar mein hai hamari aankh bhi nam hai kabhi milne chale aao mere hamrah garche dur tak logon ki raunaq hai magar jaise koi kam hai kabhi milne chale aao tumhein to ilm hai mere dil-e-wahshi ke zakhmon ko tumhaara wasl marham hai kabhi milne chale aao andheri raat ki gahri khamoshi aur tanha dil diye ki lau bhi maddham hai kabhi milne chale aao tumhaare ruth ke jaane se hum ko aisa lagta hai muqaddar hum se barham hai kabhi milne chale aao hawaon aur phulon ki nai khushbu batati hai tere aane ka mausam hai kabhi milne chale aao
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है मुझे झूटे दर-ओ-दीवार चमकाना नहीं आता मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता अगर सहरा में हैं तो आप ख़ुद आए हैं सहरा में किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा 'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता
Adeem Hashmi
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तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए कट ही गई जुदाई भी कब ये हुआ कि मर गए तेरे भी दिन गुज़र गए मेरे भी दिन गुज़र गए तू भी कुछ और और है हम भी कुछ और और हैं जाने वो तू किधर गया जाने वो हम किधर गए राहों में ही मिले थे हम राहें नसीब बन गईं वो भी न अपने घर गया हम भी न अपने घर गए वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया दिल में तिरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का सहरा उमड उमड पड़े दरिया बिफर बिफर गए वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए कोई कनार-ए-आबजू बैठा हुआ है सर-निगूँ कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया ऐसा लगा कि हश्र तक सारे ही पल ठहर गए बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए आब-ए-मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है तैरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात-ओ-मौत है वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए
Adeem Hashmi
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