bikhar jaenge ham kya jab tamasha khatm hoga mire maabud akhir kab tamasha khatm hoga charaghh-e-hujra-e-darvesh ki bujhti hui lau hava se kah gai hai ab tamasha khatm hoga kahani men nae kirdar shamil ho gae hain nahin maalum ab kis dhab tamasha khatm hoga kahani aap uljhi hai ki uljhai gai hai ye uqda tab khulega jab tamasha khatm hoga zamin jab adl se bhar jaegi nurun-ala-nur ba-nam-e-maslak-o-mazhab tamasha khatm hoga ye sab kath-putliyan raqsan rahengi raat ki raat sahar se pahle pahle sab tamasha khatm hoga tamasha karne valon ko khabar di ja chuki hai ki parda kab girega kab tamasha khatm hoga dil-e-na-mutmain aisa bhi kya mayus rahna jo khalq utthi to sab kartab tamasha khatm hoga bikhar jaenge hum kya jab tamasha khatm hoga mere mabud aakhir kab tamasha khatm hoga charagh-e-hujra-e-darwesh ki bujhti hui lau hawa se kah gai hai ab tamasha khatm hoga kahani mein nae kirdar shamil ho gae hain nahin malum ab kis dhab tamasha khatm hoga kahani aap uljhi hai ki uljhai gai hai ye uqda tab khulega jab tamasha khatm hoga zamin jab adl se bhar jaegi nurun-ala-nur ba-nam-e-maslak-o-mazhab tamasha khatm hoga ye sab kath-putliyan raqsan rahengi raat ki raat sahar se pahle pahle sab tamasha khatm hoga tamasha karne walon ko khabar di ja chuki hai ki parda kab girega kab tamasha khatm hoga dil-e-na-mutmain aisa bhi kya mayus rahna jo khalq utthi to sab kartab tamasha khatm hoga
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी
Iftikhar Arif
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कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या
Iftikhar Arif
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ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं मगर लहजों में वीरानी बहुत है सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़ मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है न जाने कब मिरे सहरा में आए वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है न जाने कब मिरे आँगन में बरसे वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है
Iftikhar Arif
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कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में ये वक़्त किस की र'ऊनत पे ख़ाक डाल गया ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में
Iftikhar Arif
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थकन तो अगले सफ़र के लिए बहाना था उसे तो यूँँ भी किसी और सम्त जाना था वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था मता-ए-जाँ का बदल एक पल की सरशारी सुलूक ख़्वाब का आँखों से ताजिराना था हवा की काट शगूफ़ों ने जज़्ब कर ली थी तभी तो लहजा-ए-ख़ुशबू भी जारेहाना था वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था क़बा-ए-ज़र्द निगार-ए-ख़िज़ाँ पे सजती थी तभी तो चाल का अंदाज़ ख़ुसरवाना था
Iftikhar Arif
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