ghazalKuch Alfaaz

चराग़ों को उछाला जा रहा है हवा पर रो'ब डाला जा रहा है न हार अपनी न अपनी जीत होगी मगर सिक्का उछाला जा रहा है वो देखो मय-कदे के रास्ते में कोई अल्लाह-वाला जा रहा है थे पहले ही कई साँप आस्तीं में अब इक बिच्छू भी पाला जा रहा है मिरे झूटे गिलासों की छका कर बहकतों को सँभाला जा रहा है हमी बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन हमें घर से निकाला जा रहा है जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो मोहब्बत करने वाला जा रहा है

Related Ghazal

गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए

Tehzeeb Hafi

124 likes

ये किस तरह का तअ'ल्लुक़ है आप का मेरे साथ मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ यही कहीं हमें रस्तों ने बद-दुआ दी थी मगर मैं भूल गया और कौन था मेरे साथ वो झाँकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है तुझे यक़ीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ

Tehzeeb Hafi

92 likes

किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम

Ahmad Faraz

46 likes

उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

Jaun Elia

61 likes

कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है

Jawwad Sheikh

39 likes

More from Rahat Indori

शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

Rahat Indori

4 likes

जो मंसबों के पुजारी पहन के आते हैं कुलाह तौक़ से भारी पहन के आते हैं अमीर-ए-शहर तिरी तरह क़ीमती पोशाक मिरी गली में भिकारी पहन के आते हैं यही अक़ीक़ थे शाहों के ताज की ज़ीनत जो उँगलियों में मदारी पहन के आते हैं हमारे जिस्म के दाग़ों पे तब्सिरा करने क़मीसें लोग हमारी पहन के आते हैं इबादतों का तहफ़्फ़ुज़ भी उन के ज़िम्में है जो मस्जिदों में सफ़ारी पहन के आते हैं

Rahat Indori

2 likes

फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे आँसुओं में भीगने के बा'द भारी हो गए

Rahat Indori

2 likes

पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है वो अब भी इक फटे रूमाल पर ख़ुश्बू लगाता है उसे कह दो कि ये ऊँचाइयाँ मुश्किल से मिलती हैं वो सूरज के सफ़र में मोम के बाज़ू लगाता है मैं काली रात के तेज़ाब से सूरज बनाता हूँ मिरी चादर में ये पैवंद इक जुगनू लगाता है यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है नमाज़ें मुस्तक़िल पहचान बन जाती है चेहरों की तिलक जिस तरह माथे पर कोई हिन्दू लगाता है न जाने ये अनोखा फ़र्क़ इस में किस तरह आया वो अब कॉलर में फूलों की जगह बिच्छू लगाता है अँधेरे और उजाले में ये समझौता ज़रूरी है निशाने हम लगाते हैं ठिकाने तू लगाता है

Rahat Indori

4 likes

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए

Rahat Indori

6 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Rahat Indori.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Rahat Indori's ghazal.