ghazalKuch Alfaaz

दवा से हल न हुआ तो दुआ पे छोड़ दिया तिरा मोआ'मला हम ने ख़ुदा पे छोड़ दिया बहुत ख़याल रखा मेरा और दरख़्तों का फिर उस ने दोनों को आब-ओ-हवा पे छोड़ दिया मुआ'फ़ वो करें जिन का क़ुसूर-वार है तू अदालतों ने तुझे किस बिना पे छोड़ दिया बग़ैर कुछ कहे मैं ने पलटने का सोचा और एक फूल दर-ए-इल्तिजा पे छोड़ दिया

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था

Kushal Dauneria

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम' सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के

Khurram Afaq

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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं जो तेरे साथ उठते बैठते हैं अकेले बैठना होगा किसी को अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से कहा भी था कि पीछे बैठते हैं यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं निगाहें क्यूँँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़' शजर पर ही परिंदे बैठते हैं

Khurram Afaq

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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई कुछ आँखों में तो हो गया आबाद वो चेहरा कुछ बस्तियों में आज भी बिजली नहीं आई हर रोज़ पलट आते थे मेहमान किसी के हर रोज़ ये कहते थे कि गाड़ी नहीं आई वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई

Khurram Afaq

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जब हम मुट्ठी खोलेंगे नई कहानी खोलेंगे ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं देर से पट्टी खोलेंगे चेहरा पढ़ने वाले चोर गठरी थोड़ी खोलेंगे दिल का वहम निकालेंगे गले की डोरी खोलेंगे वो ख़ुद थोड़ी आएगा नौकर कुंडी खोलेंगे ज़ोर से गाँठ लगाई थी दाँत से रस्सी खोलेंगे

Khurram Afaq

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बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थो पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर लिए तो बाँहे खुले छोड़ दी क्या अनोखा यक़ीं था जो उस दिन उतारा गया शहर पर घर पलटते हुए ताजिरो ने दुकानें खुली छोड़ दी मेरे क़ाबू में हो कर भी वो इतना सरकश है तो सोचिए क्या बनेगा अगर मैं ने उस की लगा में खुली छोड़ दी जिस ने आते हुए मेरी तरतीब पर इतने जुमले कसे उस ने जाते हुए मेरे दिल की दराज़ें खुले छोड़ दी

Khurram Afaq

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