dhadakta jaata hai dil muskurane valon ka utha nahin hai abhi e'tibar nalon ka ye mukhtasar si hai rudad-e-subh-e-mai-khana zamin pe dher tha tuute hue piyalon ka ye khauf hai ki saba ladkhada ke gir na pade payam le ke chali hai shikasta-halon ka na aaen ahl-e-khirad vadi-e-junun ki taraf yahan guzar nahin daman bachane valon ka lipat lipat ke gale mil rahe the khanjar se bade ghhazab ka kaleja tha marne valon ka dhadakta jata hai dil muskurane walon ka utha nahin hai abhi e'tibar nalon ka ye mukhtasar si hai rudad-e-subh-e-mai-khana zamin pe dher tha tute hue piyalon ka ye khauf hai ki saba ladkhada ke gir na pade payam le ke chali hai shikasta-haalon ka na aaen ahl-e-khirad wadi-e-junun ki taraf yahan guzar nahin daman bachane walon ka lipat lipat ke gale mil rahe the khanjar se bade ghazab ka kaleja tha marne walon ka
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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More from Kaleem Aajiz
मिरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुँचे मुझे डर ये है बुराई तिरे नाम तक न पहुँचे मिरे पास क्या वो आते मिरा दर्द क्या मिटाते मिरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुँचे हो किसी का मुझ पे एहसाँ ये नहीं पसंद मुझ को तिरी सुब्ह की तजल्ली मिरी शाम तक न पहुँचे तिरी बे-रुख़ी पे ज़ालिम मिरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुँचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मो'तरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुँचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मिरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुँचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियाँ से कभी दाम तक न पहुँचे उन्हें मेहरबाँ समझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुँचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुँचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मिरा ज़िक्र तक न आए मिरा नाम तक न पहुँचे तुम्हें याद ही न आऊँ ये है और बात वर्ना मैं नहीं हूँ दूर इतना कि सलाम तक न पहुँचे
Kaleem Aajiz
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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे
Kaleem Aajiz
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मैं रोऊँ हूँ रोना मुझे भाए है किसी का भला इस में क्या जाए है दिल आए है फिर दिल में दर्द आए है यूँँ ही बात में बात बढ़ जाए है कोई देर से हाथ फैलाए है वो ना-मेहरबाँ आए है जाए है मोहब्बत में दिल जाए गर जाए है जो खोए नहीं है वो क्या पाए है जुनूँ सब इशारे में कह जाए है मगर अक़्ल को कब समझ आए है पुकारूँ हूँ लेकिन न बाज़ आए है ये दुनिया कहाँ डूबने जाए है ख़मोशी में हर बात बन जाए है जो बोले है दीवाना कहलाए है क़यामत जहाँ आएगी आएगी यहाँ सुब्ह आए है शाम आए है जुनूँ ख़त्म दार-ओ-रसन पर नहीं ये रस्ता बहुत दूर तक जाए है
Kaleem Aajiz
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मुँह फ़क़ीरों से न फेरा चाहिए ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए चाह का मेआ'र ऊँचा चाहिए जो न चाहें उन को चाहा चाहिए कौन चाहे है किसी को बे-ग़रज़ चाहने वालों से भागा चाहिए हम तो कुछ चाहे हैं तुम चाहो हो कुछ वक़्त क्या चाहे है देखा चाहिए चाहते हैं तेरे ही दामन की ख़ैर हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए बे-रुख़ी भी नाज़ भी अंदाज़ भी चाहिए लेकिन न इतना चाहिए हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें आप कह लीजे जो कहना चाहिए बात चाहे बे-सलीक़ा हो 'कलीम' बात कहने का सलीक़ा चाहिए
Kaleem Aajiz
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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे
Kaleem Aajiz
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