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दुखे हुए हैं हमें और अब दुखाओ मत जो हो गए हो फ़साना तो याद आओ मत ख़याल-ओ-ख़्वाब में परछाइयाँ सी नाचती हैं अब इस तरह तो मिरी रूह में समाओ मत ज़मीं के लोग तो क्या दो दिलों की चाहत में ख़ुदा भी हो तो उसे दरमियान लाओ मत तुम्हारा सर नहीं तिफ़्लान-ए-रह-गुज़र के लिए दयार-ए-संग में घर से निकल के जाओ मत सिवाए अपने किसी के भी हो नहीं सकते हम और लोग हैं लोगों हमें सताओ मत हमारे अहद में ये रस्म-ए-आशिक़ी ठहरी फ़क़ीर बन के रहो और सदा लगाओ मत वही लिखो जो लहू की ज़बाँ से मिलता है सुख़न को पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ में छुपाओ मत सुपुर्द कर ही दिया आतिश-ए-हुनर के तो फिर तमाम ख़ाक ही हो जाओ कुछ बचाओ मत

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

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हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते हम बहर-हाल बसर ख़्वाब तुम्हारा करते एक ऐसी भी घड़ी इश्क़ में आई थी कि हम ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते मेहव-ए-आराइश-ए-रुख़ है वो क़यामत सर-ए-बाम आँख अगर आईना होती तो नज़ारा करते एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे किस से करते जो कोई इश्क़ दोबारा करते जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए फिर कोई आए यहाँ कैसे गवारा करते कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब तेरी जानिब ही तिरे लोग इशारा करते ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ और तिरा हुस्न कहाँ हम तिरे चेहरे से आईना सँवारा करते

Obaidullah Aleem

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जो उस ने किया उसे सिला दे मौला मुझे सब्र की जज़ा दे या मेरे दिए की लौ बढ़ा दे या रात को सुब्ह से मिला दे सच हूँ तो मुझे अमर बना दे झूटा हूँ तो नक़्श सब मिटा दे ये क़ौम अजीब हो गई है इस क़ौम को ख़ू-ए-अम्बिया दे उतरेगा न कोई आसमाँ से इक आस में दिल मगर सदा दे बच्चों की तरह ये लफ़्ज़ मेरे माबूद इन्हें बोलना सिखा दे दुख दहर के अपने नाम लिक्खूँ हर दुख मुझे ज़ात का मज़ा दे इक मेरा वजूद सुन रहा है इल्हाम जो रात की हवा दे मुझ से मिरा कोई मिलने वाला बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे चेहरा मुझे अपना देखने को अब दस्त-ए-हवस में आईना दे जिस शख़्स ने उम्र-ए-हिज्र काटी उस शख़्स को एक रात क्या दे दुखता है बदन कि फिर मिले वो मिल जाए तो रूह को दिखा दे क्या चीज़ है ख़्वाहिश-ए-बदन भी हर बार नया ही ज़ाइक़ा दे छूने में ये डर कि मर न जाऊँ छू लूँ तो वो ज़िंदगी सिवा दे

Obaidullah Aleem

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पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग महफ़िल-ए-वक़्त तिरी रूह-ए-रवाँ हैं हम लोग दोश पर बार-ए-शब-ए-ग़म लिए गुल की मानिंद कौन समझे कि मोहब्बत की ज़बाँ हैं हम लोग ख़ूब पाया है सिला तेरी परस्तारी का देख ऐ सुब्ह-ए-तरब आज कहाँ हैं हम लोग इक मता-ए-दिल-ओ-जाँ पास थी सो हार चुके हाए ये वक़्त कि अब ख़ुद पे गराँ हैं हम लोग निकहत-ए-गुल की तरह नाज़ से चलने वालो हम भी कहते थे कि आसूदा-ए-जाँ हैं हम लोग कोई बतलाए कि कैसे ये ख़बर आम करें ढूँडती है जिसे दुनिया वो निशाँ हैं हम लोग क़िस्मत-ए-शब-ज़दगाँ जाग ही जाएगी 'अलीम' जरस-ए-क़ाफ़िला-ए-ख़ुश-ख़बराँ हैं हम लोग

Obaidullah Aleem

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चेहरा हुआ मैं और मिरी तस्वीर हुए सब मैं लफ़्ज़ हुआ मुझ में ही ज़ंजीर हुए सब बुनियाद भी मेरी दर-ओ-दीवार भी मेरे ता'मीर हुआ मैं कि ये ता'मीर हुए सब वैसे ही लिखोगे तो मिरा नाम भी होगा जो लफ़्ज़ लिखे वो मिरी जागीर हुए सब मरते हैं मगर मौत से पहले नहीं मरते ये वाक़िआ'' ऐसा है कि दिल-गीर हुए सब वो अहल-ए-क़लम साया-ए-रहमत की तरह थे हम इतने घटे अपनी ही ता'ज़ीर हुए सब उस लफ़्ज़ की मानिंद जो खुलता ही चला जाए ये ज़ात-ओ-ज़माँ मुझ से ही तहरीर हुए सब इतना सुख़न-ए-'मीर' नहीं सहल ख़ुदा ख़ैर नक़्क़ाद भी अब मो'तक़िद-ए-'मीर' हुए सब

Obaidullah Aleem

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