ghazalKuch Alfaaz

ek naghhma ek taara ek ghhuncha ek jaam ai ghham-e-dauran ghham-e-dauran tujhe mera salam zulf avara gareban chaak ghabrai nazar in dinon ye hai jahan men zindagani ka nizam chand taare tuut kar daman men mere aa gire main ne puchha tha sitaron se tire ghham ka maqam kah rahe hain chand bichhde rahravon ke naqsh-e-pa ham karenge inqalab-e-justuju ka ehtimam pad gaiin pairahan-e-subh-e-chaman par silvaten yaad aa kar rah gai hai be-khudi ki ek shaam teri ismat ho ki ho mere hunar ki chandni vaqt ke bazar men har chiiz ke lagte hain daam ham banaenge yahan 'saghhar' nai tasvir-e-shauq ham takhayyul ke mujaddid ham tasavvur ke imaam ek naghma ek tara ek ghuncha ek jam ai gham-e-dauran gham-e-dauran tujhe mera salam zulf aawara gareban chaak ghabrai nazar in dinon ye hai jahan mein zindagani ka nizam chand tare tut kar daman mein mere aa gire main ne puchha tha sitaron se tere gham ka maqam kah rahe hain chand bichhde rahrawon ke naqsh-e-pa hum karenge inqalab-e-justuju ka ehtimam pad gain pairahan-e-subh-e-chaman par silwaten yaad aa kar rah gai hai be-khudi ki ek sham teri ismat ho ki ho mere hunar ki chandni waqt ke bazar mein har chiz ke lagte hain dam hum banaenge yahan 'saghar' nai taswir-e-shauq hum takhayyul ke mujaddid hum tasawwur ke imam

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया 'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया

Saghar Siddiqui

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ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा जा चुकी है बहार चुप हो जा अब न आएँगे रूठने वाले दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू रूठ जाते हैं यार चुप हो जा हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा हादसों की न आँख खुल जाए हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र' टूट जाते हैं तार चुप हो जा

Saghar Siddiqui

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