ham bahar haal dil o jaan se tumhare hote tum bhi ik-adh ghadi kaash hamare hote aks paani men mohabbat ke utare hote ham jo baithe hue dariya ke kinare hote jo mah o saal guzare hain bichhad kar ham ne vo mah o saal agar saath guzare hote kya abhi biich men divar koi baaqi hai kaun sa ghham hai bhala tum ko hamare hote aap to aap hain khaliq bhi hamara hota ham zarurat men kisi ko na pukare hote saath ahbab ke hasid bhi zaruri hain 'adim' ham sukhan apna sunate jahan saare hote hum bahar haal dil o jaan se tumhaare hote tum bhi ik-adh ghadi kash hamare hote aks pani mein mohabbat ke utare hote hum jo baithe hue dariya ke kinare hote jo mah o sal guzare hain bichhad kar hum ne wo mah o sal agar sath guzare hote kya abhi bich mein diwar koi baqi hai kaun sa gham hai bhala tum ko hamare hote aap to aap hain khaliq bhi hamara hota hum zarurat mein kisi ko na pukare hote sath ahbab ke hasid bhi zaruri hain 'adim' hum sukhan apna sunate jahan sare hote
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है मुझे झूटे दर-ओ-दीवार चमकाना नहीं आता मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता अगर सहरा में हैं तो आप ख़ुद आए हैं सहरा में किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा 'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता
Adeem Hashmi
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तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए कट ही गई जुदाई भी कब ये हुआ कि मर गए तेरे भी दिन गुज़र गए मेरे भी दिन गुज़र गए तू भी कुछ और और है हम भी कुछ और और हैं जाने वो तू किधर गया जाने वो हम किधर गए राहों में ही मिले थे हम राहें नसीब बन गईं वो भी न अपने घर गया हम भी न अपने घर गए वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया दिल में तिरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का सहरा उमड उमड पड़े दरिया बिफर बिफर गए वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए कोई कनार-ए-आबजू बैठा हुआ है सर-निगूँ कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया ऐसा लगा कि हश्र तक सारे ही पल ठहर गए बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए आब-ए-मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है तैरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात-ओ-मौत है वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए
Adeem Hashmi
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