ghazalKuch Alfaaz

hamare shahr men elan-e-id ho gaya hai tire na hone ka ghham aur shadid ho gaya hai hamari ruuh badan tod kar nikal sakti hamara dard kuchh itna shadid ho gaya hai hamare andar ik achchha sharif insan tha hamare saath men rah kar palid ho gaya hai faqat dimaghh hi rakhta hai ab hamara khayal hamara dil to kisi ka murid ho gaya hai hamare shahr mein elan-e-id ho gaya hai tere na hone ka gham aur shadid ho gaya hai hamari ruh badan tod kar nikal sakti hamara dard kuchh itna shadid ho gaya hai hamare andar ek achchha sharif insan tha hamare sath mein rah kar palid ho gaya hai faqat dimagh hi rakhta hai ab hamara khayal hamara dil to kisi ka murid ho gaya hai

Related Ghazal

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

More from Ismail Raaz

रू-ब-रू तेरे बहुत देर बिठाया गया मैं वज्द में आया नहीं वज्द में लाया गया मैं सिलसिला ख़त्म न होगा ये दिल-आज़ारी का इस से पहले भी कई बार मनाया गया मैं यूँँ लगा सब ने गवाही दी कि तू मेरा है जब तिरे नाम से बस्ती में सताया गया मैं जब जब असरार मिरी ज़ात के खुलने से रहे छेड़ कर ज़िक्र तिरा वज्द में लाया गया मैं मुझ से रस्ते में ठहरने की अज़िय्यत पूछो ठोकरें मार के रस्ते से हटाया गया मैं

Ismail Raaz

9 likes

ठोकरों में असर नहीं आया दिल अभी राह पर नहीं आया ख़ुद में देखा जो झाँक कर तिरे बा'द मुझ को मैं भी नज़र नहीं आया मुद्दतों से सुकूत चीख़ता है लेकिन अब तक असर नहीं आया चाँद किस तमकनत से निकलेगा तू अगर बाम पर नहीं आया कब से घर छोड़ कर गया हुआ हूँ कब से मैं लौट कर नहीं आया

Ismail Raaz

10 likes

अब इस भ्रम में हर एक रात काटनी है मुझे के आने वाली तेरे साथ काटनी हैं मुझे तुझे दिलाना है एहसास अपने इस दुख का तू कुछ तो बोल तेरी बात काटनी है मुझे मुझे तुलू-ए-सहर की तसल्लीया मत दे अभी तो ये शब-ए-जुलमात काटनी हैं मुझे

Ismail Raaz

24 likes

ज़माना इस लिए लहजा बदल रहा है दोस्त हमारा वक़्त ज़रा पीछे चल रहा दोस्त मैं मुस्कुरा रहा हूँ तेरी रुख़्सती पे अगर तो मुझ में कौन है जो हाथ मल रहा है दोस्त न मिल सकी मिरे हिस्से की रौशनी भी मुझे मिरा चराग़ कहीं और जल रहा है दोस्त पलीद कर के हमारे वजूद की मिट्टी हमारे नाम का सूरज निकल रहा है दोस्त बताएँ क्या तुझे अब ख़स्ता-हाली-ए-दिल 'राज़' शिकस्ता ख़्वाब के टुकड़ों पे पल रहा है दोस्त

Ismail Raaz

15 likes

पड़ी है रात कोई ग़म-शनास भी नहीं है शराब खाने में आधा गिलास भी नहीं है मैं दिल को ले कर कहा निकलूं इतनी रात गए मकान उस का कहीं आसपास भी नहीं है यहाँ तो लड़कियां अच्छा सा घर भी चाहती है हमारे पास तो अच्छा लिबास भी नहीं है

Ismail Raaz

19 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ismail Raaz.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ismail Raaz's ghazal.