ghazalKuch Alfaaz

jab tak nigar-e-dasht ka siina dukha na tha sahra men koi lala-e-sahra khila na tha do jhilen us ki ankhon men lahra ke so gaiin us vaqt meri 'umr ka dariya chadha na tha jaagi na thiin nason men tamanna ki naginen us gandumi sharab ko jab tak chakha na tha dhunda karo jahan-e-tahayyur men 'umr bhar vo chalti phirti chhanv hai main ne kaha na tha ik bevafa ke samne aansu bahate ham itna hamari aankh ka paani mara na tha vo kaale hont jaam samajh kar chadha gae vo aab jis se main ne vuzu tak kiya na tha sab log apne apne khudaon ko laae the ik ham hi aise the ki hamara khuda na tha vo kaali ankhen shahr men mashhur thiin bahut tab un pe mote shishon ka chashma chadha na tha main sahib-e-ghhazal tha hasinon ki bazm men sar par ghanere baal the matha khula na tha jab tak nigar-e-dasht ka sina dukha na tha sahra mein koi lala-e-sahra khila na tha do jhilen us ki aankhon mein lahra ke so gain us waqt meri 'umr ka dariya chadha na tha jagi na thin nason mein tamanna ki naginen us gandumi sharab ko jab tak chakha na tha dhunda karo jahan-e-tahayyur mein 'umr bhar wo chalti phirti chhanw hai main ne kaha na tha ek bewafa ke samne aansu bahate hum itna hamari aankh ka pani mara na tha wo kale hont jam samajh kar chadha gae wo aab jis se main ne wuzu tak kiya na tha sab log apne apne khudaon ko lae the ek hum hi aise the ki hamara khuda na tha wo kali aankhen shahr mein mashhur thin bahut tab un pe mote shishon ka chashma chadha na tha main sahib-e-ghazal tha hasinon ki bazm mein sar par ghanere baal the matha khula na tha

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है इक ज़ेहन-ए-परेशाँ में ख़्वाब-ए-ग़ज़लिस्ताँ है पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है हम-रंग-ए-दिल-ए-पुर-ख़ूँ हर लाला-ए-सहराई गेसू की तरह मुज़्तर अब रात की रानी है जिस संग पे नज़रें कीं ख़ुर्शीद-ए-हक़ीक़त है जिस चाँद से मुँह मोड़ा पत्थर की कहानी है ऐ पीर-ए-ख़िरद-मंदाँ दिल की भी ज़रूरत है ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ है ये मुल्क-ए-जवानी है ग़म वज्ह-ए-फ़िगार-ए-दिल ग़म वज्ह-ए-क़रार-ए-दिल आँसू कभी शीशा है आँसू कभी पानी है इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गँवानी है दिन तल्ख़ हक़ाएक़ के सहराओं का सूरज है शब गेसु-ए-अफ़्साना यादों की कहानी है वो हुस्न जिसे हम ने रुस्वा किया दुनिया में नादीदा हक़ीक़त है ना-गुफ़्ता कहानी है वो मिस्रा-ए-आवारा दीवानों पे भारी है जिस में तिरे गेसू की बे-रब्त कहानी है हम ख़ुशबू-ए-आवारा हम नूर-ए-परेशाँ हैं ऐ 'बद्र' मुक़द्दर में आशुफ़्ता-बयानी है

Bashir Badr

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चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली सह में सह में हाथों ने इक किताब फिर खोली दाएरे अँधेरों के रौशनी के पोरों ने कोट के बटन खोले टाई की गिरह खोली शीशे की सिलाई में काले भूत का चढ़ना बाम काठ का घोड़ा नीम काँच की गोली बर्फ़ में दबा मक्खन मौत रेल और रिक्शा ज़िंदगी ख़ुशी रिक्शा रेल मोटरें डोली इक किताब चाँद और पेड़ सब के काले कॉलर पर ज़ेहन टेप की गर्दिश मुँह में तोतों की बोली वो नहीं मिली हम को हुक बटन सरकती ज़ीन ज़िप के दाँत खुलते ही आँख से गिरी चोली

Bashir Badr

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उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं उन्हें कभी न बताना मैं उन की आँखों में वो लोग फूल समझ कर मुझे मसलते हैं कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मिरे साथ साथ चलते हैं ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं

Bashir Badr

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दिल में इक तस्वीर छुपी थी आन बसी है आँखों में शायद हम ने आज ग़ज़ल सी बात लिखी है आँखों में जैसे इक हरीजन लड़की मंदिर के दरवाज़े पर शाम दियों की थाल सजाए झाँक रही है आँखों में इस रूमाल को काम में लाओ अपनी पलकें साफ़ करो मैला मैला चाँद नहीं है धूल जमी है आँखों में पढ़ता जा ये मंज़र-नामा ज़र्द अज़ीम पहाड़ों का धूप खिली पलकों के ऊपर बर्फ़ जमी है आँखों में मैं ने इक नॉवेल लिक्खा है आने वाली सुब्ह के नाम कितनी रातों का जागा हूँ नींद भरी है आँखों में

Bashir Badr

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