ghazalKuch Alfaaz

कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए तुम्हीं कहो कि जो तुम यूँँ कहो तो क्या कहिए न कहियो ता'न से फिर तुम कि हम सितमगर हैं मुझे तो ख़ू है कि जो कुछ कहो बजा कहिए वो नेश्तर सही पर दिल में जब उतर जावे निगाह-ए-नाज़ को फिर क्यूँँ न आश्ना कहिए नहीं ज़रीया-ए-राहत जराहत-ए-पैकाँ वो ज़ख़्म-ए-तेग़ है जिस को कि दिल-कुशा कहिए जो मुद्दई' बने उस के न मुद्दई' बनिए जो ना-सज़ा कहे उस को न ना-सज़ा कहिए कहीं हक़ीक़त-ए-जाँ-काही-ए-मरज़ लिखिए कहीं मुसीबत-ए-ना-साज़ी-ए-दवा कहिए कभी शिकायत-ए-रंज-ए-गिराँ-नशीं कीजे कभी हिकायत-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कहिए रहे न जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजे कटे ज़बान तो ख़ंजर को मर्हबा कहिए नहीं निगार को उल्फ़त न हो निगार तो है रवानी-ए-रविश ओ मस्ती-ए-अदा कहिए नहीं बहार को फ़ुर्सत न हो बहार तो है तरावत-ए-चमन ओ ख़ूबी-ए-हवा कहिए सफ़ीना जब कि किनारे पे आ लगा 'ग़ालिब' ख़ुदा से क्या सितम-ओ-जौर-ए-ना-ख़ुदा कहिए

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दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है आवारा-मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

Nida Fazli

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तेरी तरफ़ मेरा ख़याल क्या गया के फिर मैं तुझ को सोचता चला गया ये शहर बन रहा था मेरे सामने ये गीत मेरे सामने लिखा गया ये वस्ल सारी उम्र पर मुहीत है ये हिज्र एक रात में समा गया मुझे किसी की आस थी न प्यास थी ये फूल मुझ को भूल कर दिया गया बिछड़ के साँस खेंचना मुहाल था मैं ज़िंदगी से हाथ खेंचता गया मैं एक रोज़ दस्त क्या गया के फिर वो बाग़ मेरे हाथ से चला गया

Tehzeeb Hafi

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कर रहे हैं सब अदब सब ठीक है और वो भी बे-सबब सब ठीक है पूछना था वाक़ई सब ठीक था कह रहे थे आप जब सब ठीक है सोचो दरिया हाल पूछे एक दिन और कह दें तश्ना-लब सब ठीक है ओढ़ ली है चेहरे पे झूठी हँसी अब बना तस्वीर अब सब ठीक है

Ahmad Abdullah

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कोई मिसाल नहीं है तिरी मिसाल के बा'द मैं बे ख़याल हुआ हूँ तिरे ख़याल के बा'द बस इक मलाल पे तू ज़िन्दगी तमाम न कर बड़े मलाल मिलेगें मिरे मलाल के बा'द हर एक ज़ख़्म को अश्कों से धो के चूम लिया मैं ऐसे ठीक हुआ उस की देख-भाल के बा'द उलझ के रह गया वो जाल में तबीबों के मरीज़ घर नहीं लौटा है अस्पताल के बा'द दुआ सलाम से आगे मैं बढ़ नहीं पाता उसे भी सोचना पड़ता है हाल-चाल के बा'द हमारे बीच में जो है सही नहीं है वो उसे ये याद भी आया तो चार साल के बा'द हज़ारों ख़्वाब जो आँखों के आसरे थे कभी यतीम हो गए आँखों के इंतिक़ाल के बा'द

Varun Anand

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़

Mirza Ghalib

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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम

Mirza Ghalib

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कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया दिल कहाँ कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ' पाया इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया सादगी ओ पुरकारी बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया ग़ुंचा फिर लगा खिलने आज हम ने अपना दिल ख़ूँ किया हुआ देखा गुम किया हुआ पाया हाल-ए-दिल नहीं मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी हम ने बार-हा ढूँडा तुम ने बार-हा पाया शोर-ए-पंद-ए-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का आप से कोई पूछे तुम ने क्या मज़ा पाया है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब हम ने दश्त-ए-इम्काँ को एक नक़्श-ए-पा पाया बे-दिमाग़-ए-ख़जलत हूँ रश्क-ए-इम्तिहाँ ता-कै एक बेकसी तुझ को आलम-आश्ना पाया ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद कार-ख़ाना-ए-तिफ़्ली यास को दो-आलम से लब-ब-ख़ंदा वा पाया क्यूँँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया शब नज़ारा-परवर था ख़्वाब में ख़याल उस का सुब्ह मौजा-ए-गुल को नक़्श-ए-बोरिया पाया जिस क़दर जिगर ख़ूँ हो कूचा दादन-ए-गुल है ज़ख्म-ए-तेग़-ए-क़ातिल को तुर्फ़ा दिल-कुशा पाया है मकीं की पा-दारी नाम-ए-साहिब-ए-ख़ाना हम से तेरे कूचे ने नक़्श-ए-मुद्दआ पाया ने 'असद' जफ़ा-साइल ने सितम जुनूँ-माइल तुझ को जिस क़दर ढूँडा उल्फ़त-आज़मा पाया

Mirza Ghalib

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हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ' क्या कहाँ तक ऐ सरापा नाज़ क्या क्या नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ शिकायत-हा-ए-रंगीं का गिला क्या निगाह-ए-बे-महाबा चाहता हूँ तग़ाफ़ुल-हा-ए-तमकीं-आज़मा क्या फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बे-ख़ुदी है तग़ाफ़ुल-हा-ए-साक़ी का गिला क्या दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है ग़म-ए-आवारगी-हा-ए-सबा क्या दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर हम उस के हैं हमारा पूछना क्या मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन इधर देख शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या सुन ऐ ग़ारत-गर-ए-जिंस-ए-वफ़ा सुन शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा क्या किया किस ने जिगर-दारी का दावा शकीब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूँँ ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़त-रुबा क्या बला-ए-जाँ है 'ग़ालिब' उस की हर बात इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या

Mirza Ghalib

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