काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी ख़ामोशी का हासिल भी इक लंबी सी ख़ामोशी थी उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी कल साहिल पर लेटे लेटे कितनी सारी बातें कीं आप का हुंकारा न आया चाँद ने बात कराई भी
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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले
Himanshi babra KATIB
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है तेरे साथ तिरी याद आई क्या तू सच-मुच आई है शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का मुझ को देखते ही जब उस की अँगड़ाई शरमाई है उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रिफ़ाक़त का एहसास जब उस के मल्बूस की ख़ुश्बू घर पहुंचाने आई है हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में सोज़-ए-रक़ाबत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे पागल कुछ तो सोच ये तू ने कैसी शक्ल बनाई है इश्क़-ए-पेचाँ की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम इश्क़ का पेशा हुस्न-परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है आज बहुत दिन बा'द मैं अपने कमरे तक आ निकला था जूँही दरवाज़ा खोला है उस की ख़ुश्बू आई है एक तो इतना हब्स है फिर मैं सांसें रोके बैठा हूँ वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है
Jaun Elia
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दो नावों पर पाँव पसारे ऐसे कैसे वो भी प्यारा हम भी प्यारे ऐसे कैसे सूरज बोला बिन मेरे दुनिया अंधी है हँस कर बोले चाँद सितारे ऐसे कैसे तेरे हिस्से की ख़ुशियों से बैर नहीं पर मेरे हक़ में सिर्फ़ ख़सारे ऐसे कैसे गालों पर बोसा दे कर जब चली गई वो कहते रह गए होंठ बिचारे ऐसे कैसे मुझ जैसों को यां पर देख के कहते हैं वो इतना आगे बिना सहारे ऐसे कैसे जैसे ही मक़्ते पर पहुँची ग़ज़ल असद की बोल उठे सारे के सारे ऐसे कैसे
Asad Akbarabadi
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कुछ ऐसे रास्तों से इश्क़ का सफ़र जाए तुम्हारा हिज्र बहुत दूर से गुज़र जाए उदासियों से भरी कच्ची उम्र की ये नस्ल जो शा'इरी न करे तो दुखों से मर जाए पचास लोगों से वो रोज़ मिलती है और मैं किसी को देख लूँ तो उस का मुँह उतर जाए घटा छटे तो दिखे चाँद भी सितारे भी जो तुम हटो तो किसी और पर नज़र जाए हज़ार साल में तय्यार होने वाला मर्द उस एक गोद में सर रखते ही बिखर जाए मैं उस बदन से सभी पैरहन उतारूँ और अँधेरा जिस्म पे कपड़े का काम कर जाए मेरी हवस को कोई दूसरा मुयस्सर हो तुम्हारा हुस्न किसी और से सँवर जाए
Kushal Dauneria
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ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता यूँँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता कोई एहसास तो दरिया की अना का होता साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता क्यूँँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए एक चेहरा कोई अपना भी ख़ुदा का होता
Gulzar
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तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की क्यूँँ इतनी लंबी होती है चाँदनी रात जुदाई की नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की
Gulzar
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ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें शम्अ''' जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें निकलें दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें ग़ार के मुँह पे रखा रहने दो संग-ए-ख़ुर्शीद ग़ार में हाथ न डालो कहीं रातें निकलें
Gulzar
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तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए
Gulzar
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शाम से आज साँस भारी है बे-क़रारी सी बे-क़रारी है आप के बा'द हर घड़ी हम ने आप के साथ ही गुज़ारी है रात को दे दो चांदनी की रिदा दिन की चादर अभी उतारी है शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले कैसी चुप सी चमन में तारी है कल का हर वाक़िआ' तुम्हारा था आज की दास्तां हमारी है
Gulzar
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