koyal niin aa ke kuuk sunai basant rut baurae khas-o-am ki aai basant rut vo zard-posh jis kuun bhar aghhosh men liya goya ki tab gale siin lagai basant rut vo zard-posh jis ka ki gun gavte hain ham shokhi niin us ki naach nachai basant rut ghhunche niin is bahar men kadvaya apna dil bulbul chaman men phuul ke gaai basant rut tesu ke phuul dashna-e-khuni hue use birhan ke ji kuun hai ye kasai basant rut gaae hindol aaj kalavant khulas khulas har taan biich kya ke phulai basant rut bulbul hua hai dekh sada rang ki bahar is saal 'abru' kuun ban aai basant rut koyal nin aa ke kuk sunai basant rut baurae khas-o-am ki aai basant rut wo zard-posh jis kun bhar aaghosh mein liya goya ki tab gale sin lagai basant rut wo zard-posh jis ka ki gun gawte hain hum shokhi nin us ki nach nachai basant rut ghunche nin is bahaar mein kadwaya apna dil bulbul chaman mein phul ke gai basant rut tesu ke phul dashna-e-khuni hue use birhan ke ji kun hai ye kasai basant rut gae hindol aaj kalawant khulas khulas har tan bich kya ke phulai basant rut bulbul hua hai dekh sada rang ki bahaar is sal 'abru' kun ban aai basant rut
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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा
Kushal Dauneria
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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम
Ahmad Faraz
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तन से जब तक साँस का रिश्ता रहेगा मेरे अश्कों में तिरा हिस्सा रहेगा दूर तक कोई शनासा हो नहीं हो भीड़ में अच्छा मगर लगता रहेगा ऐसे छुटकारा नहीं देना है उस को मैं अगर मर जाऊँ तो कैसा रहेगा तय तो है अलगाव बस ये सोचना है कौन सी रुत में ये दुख अच्छा रहेगा ख़ुद से मेरी सुल्ह मुमकिन ही नहीं है जब तलक इस घर में आईना रहेगा यूँँ तो अब बिस्तर है और बीमार लेकिन साँस लेने में मज़ा आता रहेगा मैं ने कितने दिन किसी को याद रक्खा वो भी क्यूँँ मेरे लिए रोता रहेगा
Shariq Kaifi
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'नासिर' क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जाएगा लहू नाम-ए-ख़ुदा हो जवान अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
Nasir Kazmi
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सर ही अब फोड़िए नदामत में नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर सोचता हूँ तिरी हिमायत में रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया जिस्म को जिस्म की अदावत में अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है रूह शामिल नहीं शिकायत में इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैं चीख़ता हूँ बदन की उसरत में ये कुछ आसान तो नहीं है कि हम रूठते अब भी हैं मुरव्वत में वो जो ता'मीर होने वाली थी लग गई आग उस इमारत में ज़िंदगी किस तरह बसर होगी दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में हासिल-ए-कुन है ये जहान-ए-ख़राब यही मुमकिन था इतनी उजलत में फिर बनाया ख़ुदा ने आदम को अपनी सूरत पे ऐसी सूरत में और फिर आदमी ने ग़ौर किया छिपकिली की लतीफ़ सनअ'त में ऐ ख़ुदा जो कहीं नहीं मौजूद क्या लिखा है हमारी क़िस्मत में
Jaun Elia
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