mata-e-kausar-o-zamzam ke paimane tiri ankhen farishton ko bana deti hain divane tiri ankhen jahan-e-rang-o-bu uljha hua hai un ke doron men lagi hain kakul-e-taqdir suljhane tiri ankhen isharon se dilon ko chhed kar iqrar karti hain uthati hain bahar-e-nau ke nazrane tiri ankhen vo divane zamam-e-lala-o-gul thaam lete hain jinhen mansub kar deti hain virane tiri ankhen shagufon ko shararon ka machalta ruup deti hain haqiqat ko bana deti hain afsane tiri ankhen mata-e-kausar-o-zamzam ke paimane teri aankhen farishton ko bana deti hain diwane teri aankhen jahan-e-rang-o-bu uljha hua hai un ke doron mein lagi hain kakul-e-taqdir suljhane teri aankhen ishaaron se dilon ko chhed kar iqrar karti hain uthati hain bahaar-e-nau ke nazrane teri aankhen wo diwane zamam-e-lala-o-gul tham lete hain jinhen mansub kar deti hain virane teri aankhen shagufon ko shararon ka machalta rup deti hain haqiqat ko bana deti hain afsane teri aankhen
Related Ghazal
वो तो अच्छा है ग़ज़ल तेरा सहारा है मुझे वर्ना फ़िक्रों ने तो बस घेर के मारा है मुझे जिस की तस्वीर मैं काग़ज़ पे बना भी न सका उस ने मेहँदी से हथेली पे उतारा है मुझे ग़ैर के हाथ से मरहम मुझे मंज़ूर नहीं तुम मगर ज़ख़्म भी दे दो तो गवारा है मुझे
Abrar Kashif
54 likes
हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया
Mehshar Afridi
53 likes
हालत जो हमारी है तुम्हारी तो नहीं है ऐसा है तो फिर ये कोई यारी तो नहीं है तहक़ीर ना कर ये मेरी उधड़ी हुई गुदड़ी जैसी भी है अपनी है उधारी तो नहीं है तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है ये तू जो मोहब्बत में सिला माँग रहा है ऐ शख़्स तू अंदर से भिखारी तो नहीं है जितनी भी कमा ली हो बना ली हो ये दुनिया दुनिया है तो फिर दोस्त तुम्हारी तो नहीं है
Ali Zaryoun
33 likes
क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता
Waseem Barelvi
28 likes
ठहराव तो उस में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी मैं कपड़े बदलते सोचता था, वो मर्द बदल लिया करती थी मुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन सेे जल लिया करती थी आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी
Muzdum Khan
30 likes
More from Saghar Siddiqui
मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया 'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया
Saghar Siddiqui
3 likes
ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा जा चुकी है बहार चुप हो जा अब न आएँगे रूठने वाले दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू रूठ जाते हैं यार चुप हो जा हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा हादसों की न आँख खुल जाए हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र' टूट जाते हैं तार चुप हो जा
Saghar Siddiqui
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Saghar Siddiqui.
Similar Moods
More moods that pair well with Saghar Siddiqui's ghazal.







