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mohabbat tark ki main ne gareban si liya main ne zamane ab to khush ho zahr ye bhi pi liya main ne love i have renounced and sewn the collar that was ripped o world now you be happy for this poison i have sipped abhi zinda huun lekin sochta rahta huun khalvat men ki ab tak kis tamanna ke sahare ji liya main ne though i am alive, i often think, when there is no throng based on what desire, tell me, have i lived this long unhen apna nahin sakta magar itna bhi kya kam hai ki kuchh muddat hasin khvabon men kho kar ji liya main ne though i cannot possess her, it's of major consequence that for a while, her in my dreams, i did experience bas ab to daman-e-dil chhod do bekar ummido bahut dukh sah liye main ne bahut din ji liya main ne the vestment of my heart o helpless hopes now leave alone i've lived far too long and sorrows ample have i borne mohabbat tark ki main ne gareban si liya main ne zamane ab to khush ho zahr ye bhi pi liya main ne love i have renounced and sewn the collar that was ripped o world now you be happy for this poison i have sipped abhi zinda hun lekin sochta rahta hun khalwat mein ki ab tak kis tamanna ke sahaare ji liya main ne though i am alive, i often think, when there is no throng based on what desire, tell me, have i lived this long unhen apna nahin sakta magar itna bhi kya kam hai ki kuchh muddat hasin khwabon mein kho kar ji liya main ne though i cannot possess her, it's of major consequence that for a while, her in my dreams, i did experience bas ab to daman-e-dil chhod do bekar ummido bahut dukh sah liye main ne bahut din ji liya main ne the vestment of my heart o helpless hopes now leave alone i've lived far too long and sorrows ample have i borne

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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फ़न जो नादार तक नहीं पहुँचा अभी मेआ'र तक नहीं पहुँचा उस ने बर-वक़्त बे-रुख़ी बरती शौक़ आज़ार तक नहीं पहुँचा अक्स-ए-मय हो कि जल्वा-ए-गुल हो रंग-ए-रुख़्सार तक नहीं पहुँचा हर्फ़-ए-इंकार सर बुलंद रहा ज़ोफ़-ए-इक़रार तक नहीं पहुँचा हुक्म-ए-सरकार की पहुँच मत पूछ अहल-ए-सरकार तक नहीं पहुँचा अद्ल-गाहें तो दूर की शय हैं क़त्ल अख़बार तक नहीं पहुँचा इन्क़िलाबात-ए-दहर की बुनियाद हक़ जो हक़दार तक नहीं पहुँचा वो मसीहा-नफ़स नहीं जिस का सिलसिला-दार तक नहीं पहुँचा

Sahir Ludhianvi

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सदियों से इंसान ये सुनता आया है दुख की धूप के आगे सुख का साया है हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाएा है पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है अव्वल अव्वल जिस दिल ने बर्बाद किया आख़िर आख़िर वो दिल ही काम आया है इतने दिन एहसान किया दीवानों पर जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है

Sahir Ludhianvi

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देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक़ मुंतज़िर मक़्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

Sahir Ludhianvi

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जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं कैसे नादान हैं शोलों को हवा देते हैं हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं जान जाए कि रहे बात निभा देते हैं आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या हैं इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं हम ने दिल दे भी दिया अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया आप अब शौक़ से दे लें जो सज़ा देते हैं

Sahir Ludhianvi

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बर्बाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा टूटा हुआ इक़रार-ए-वफ़ा साथ लिए जा इक दिल था जो पहले ही तुझे सौंप दिया था ये जान भी ऐ जान-ए-अदा साथ लिए जा तपती हुई राहों से तुझे आँच न पहुँचे दीवानों के अश्कों की घटा साथ लिए जा शामिल है मिरा ख़ून-ए-जिगर तेरी हिना में ये कम हो तो अब ख़ून-ए-वफ़ा साथ लिए जा हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा

Sahir Ludhianvi

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