na ho ki qurb hi phir rabt-e-marg ban jaae vo ab mile to zara us se fasla rakhna na ho ki qurb hi phir rabt-e-marg ban jae wo ab mile to zara us se fasla rakhna
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो भूलने पाए न इस दश्त की वहशत दिल से शहर के बीच रहो बाग़ में आहू रक्खो ख़ुश्क हो जाएगी रोते हुए सहरा की तरह कुछ बचा कर भी तो इस आँख में आँसू रक्खो रौशनी होगी तो आ जाएगा रह-रव दिल का उस की यादों के दिए ताक़ में हर-सू रक्खो याद आएगी तुम्हारी ही सफ़र में उस को उस के रूमाल में इक अच्छी सी ख़ुश्बू रक्खो अब वो महबूब नहीं अपना मगर दोस्त तो है उस से ये एक तअ'ल्लुक़ ही बहर-सू रक्खो
Iftikhar Naseem
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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़ जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम' उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना
Iftikhar Naseem
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ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे जैसे थे लोग वैसा ही होना पड़ा मुझे दुश्मन को मरते देख के लोगों के सामने दिल हँस रहा था आँख से रोना पड़ा मुझे कुछ इस क़दर थे फूल ज़मीं पर खिले हुए तारों को आसमान में बोना पड़ा मुझे ऐसी शिकस्त थी कि कटी उँगलियों के साथ काँटों का एक हार पिरोना पड़ा मुझे कारी नहीं था वार मगर एक उम्र तक आब-ए-नमक से ज़ख़्म को धोना पड़ा मुझे आसाँ नहीं है लिखना ग़म-ए-दिल की वारदात अपना क़लम लहू में डुबोना पड़ा मुझे इतनी तवील ओ सर्द शब-ए-हिज्र थी 'नसीम' कितनी ही बार जागना सोना पड़ा मुझे
Iftikhar Naseem
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लगेगा अजनबी अब क्यूँ न शहर भर मुझ को बचा गया है नज़र तू भी देख कर मुझ को मैं घूम फिर के उसी सम्त आ निकलता हूँ जकड़ रही है तिरे घर की रहगुज़र मुझ को झुलस रहा है बदन ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार बुला रहा है कोई दश्त-ए-बे-शजर मुझ को मैं संग-दिल हूँ तुझे भूलता ही जाता हूँ मैं हँस रहा हूँ तो मिल के उदास कर मुझ को मैं देखता ही रहूँगा तुझे किनारे से तू ढूँढ़ता ही रहेगा भँवर भँवर मुझ को बनी हैं तुंद हवाओं की ज़र्द दीवारें उड़ा रहा है मगर शो'ला-ए-सफ़र मुझ को बना दिया है निडर ज़िद्दी ख़्वाहिशों ने 'नसीम' ख़ुद ए'तिमाद न था अपने आप पर मुझ को
Iftikhar Naseem
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अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया तुझ को ख़त लिक्खा और लिख कर फेंक दिया ख़ुद को साकिन देखा ठहरे पानी में जाने क्या कुछ सोच के पत्थर फेंक दिया दीवारें क्यूँँ ख़ाली ख़ाली लगती हैं किस ने सब कुछ घर से बाहर फेंक दिया मैं तो अपना जिस्म सुखाने निकला था बारिश ने फिर मुझ पे समुंदर फेंक दिया वो कैसा था उस को कहाँ पर देखा था अपनी आँखों ने हर मंज़र फेंक दिया
Iftikhar Naseem
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