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na jhatko zulf se paani ye moti tuut jaenge tumhara kuchh na bigdega magar dil tuut jaenge ye bhigi raat ye bhiga badan ye husn ka aalam ye sab andaz mil kar do jahan ko luut jaenge ye nazuk lab hain ya aapas men do lipti hui kaliyan zara in ko alag kar do tarannum phuut jaenge hamari jaan le lega ye nichi aankh ka jaadu chalo achchha hua mar kar jahan se chhut jaenge na jhatko zulf se pani ye moti tut jaenge tumhaara kuchh na bigdega magar dil tut jaenge ye bhigi raat ye bhiga badan ye husn ka aalam ye sab andaz mil kar do jahan ko lut jaenge ye nazuk lab hain ya aapas mein do lipti hui kaliyan zara in ko alag kar do tarannum phut jaenge hamari jaan le lega ye nichi aankh ka jadu chalo achchha hua mar kar jahan se chhut jaenge

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

Rahat Indori

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं इक बीमार वसीयत करने वाला है रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं अभी न जाने कितना हँसना रोना है अभी तो हम सेे पहले वाले बैठे हैं साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं अंदर डोरी टूट रही है साँसों की बाहर बीमा करने वाले बैठे हैं

Shakeel Jamali

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रास्ते में फिर वही पैरों का चक्कर आ गया जनवरी गुज़रा नहीं था और दिसंबर आ गया ये शरारत है, सियासत है, के है साज़िश कोई शाख़ पर फल आएँ इस सेे पहले पत्थर आ गया मैं ने कुछ पानी बचा रखा था अपनी आँख में एक समुंदर अपने सूखे होंठ ले कर आ गया अपने दरवाज़े पे मैं ने पहले ख़ुद आवाज़ दी और फिर कुछ देर में ख़ुद ही निकल कर आ गया मैं ने बस्ती में कदम रखा तो यूँ लगा जैसे जंगल मेरे पैरो से लिपट कर आ गया पाँव के ठोकर में जिस के तेरे तख़्तों ताज है शाह से जा कर कोई कह दे कलंदर आ गया

Rahat Indori

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